कर्नाटक के मैसूर से 32 किलोमीटर दूर एक छोटा सा नगर है। उस नगर का नाम ही उस भगवान के नाम पर रखा गया है जो वहाँ विराजमान हैं। तिरुमकुडलु नरसीपुर। स्थानीय लोग इसे टी. नरसीपुर कहते हैं।
और इस नगर में एक ऐसा मंदिर है जिसके गर्भगृह में भगवान नृसिंह के हाथ में एक तराजू है। उस तराजू के एक पलड़े में एक छोटा सा बीज है — गुंजा का बीज। और उस बीज के भार के बराबर यह मंदिर काशी से अधिक पवित्र है।
यह कोई साधारण दावा नहीं। यह स्वयं भगवान नृसिंह का वचन है। और यह वचन उन्होंने एक धोबी को दिया था।
— तिरुमकुडलु नरसीपुर स्थलपुराणतिरुमकुडलु का अर्थ: तीन नदियों का वह संगम जो दक्षिण प्रयाग है
इस नगर का नाम तिरुमकुडलु क्यों पड़ा? तिरु अर्थात पवित्र। मकुडलु अर्थात तीन नदियों का मिलन। यहाँ तीन नदियाँ मिलती हैं: कावेरी, कपिला और स्पटिका सरोवर। किन्तु इसमें एक रहस्य है।
स्पटिका सरोवर आज दृष्टिगोचर नहीं होती। यह एक गुप्त नदी है — गुप्त गामिनी। ठीक वैसे ही जैसे प्रयाग में गंगा और यमुना के बीच सरस्वती गुप्त रूप से बहती है, वैसे ही यहाँ कावेरी और कपिला के बीच स्पटिका अदृश्य रूप से प्रवाहित है।
यही कारण है कि स्कन्द पुराण ने इस स्थान को त्रिमकुट क्षेत्र कहा है। जैसे काशी में तीन नदियों का संगम है, वैसे ही यहाँ कावेरी, कपिला और स्पटिका का संगम है। यह दक्षिण भारत का प्रयाग है। और यहाँ नृसिंह विराजमान हैं।
वह धोबी जिसके स्वप्न में भगवान आए: कर्नाटक का सबसे हृदयस्पर्शी प्रसंग
इस मंदिर की कथा उस धोबी से आरंभ होती है। कावेरी नदी के तट पर एक धोबी प्रतिदिन कपड़े धोने आता था। वर्षों से। दशकों से। एक विशेष बड़े पत्थर पर वह प्रतिदिन कपड़े धोता था।
और एक रात उसे स्वप्न आया। भगवान नृसिंह उसके स्वप्न में प्रकट हुए और बोले: "जिस पत्थर पर तुम प्रतिदिन कपड़े धोते हो, उसके नीचे मेरी प्रतिमा है। उसे निकालो और मेरा मंदिर बनवाओ।" धोबी चकित था। किन्तु उसके मन में एक व्यावहारिक प्रश्न था।
प्रभु, मंदिर बनाने के लिए धन कहाँ से आएगा? मैं तो एक साधारण धोबी हूँ।
— धोबी, भगवान नृसिंह के स्वप्न मेंभगवान ने मुस्कुराकर कहा: "उसी पत्थर के नीचे खोदो। स्वर्ण मुद्राएँ मिलेंगी।" धोबी जागा। नदी के तट पर गया। उसने वह पत्थर हटाया। उसके नीचे खोदा। और स्वर्ण मुद्राएँ मिलीं। उसी स्वर्ण से धोबी ने मंदिर का निर्माण करवाया। वह पत्थर जो उसकी जीविका का साधन था, वही भगवान के मंदिर का भाग बन गया।
देहली पर धोबी की प्रतिमा: जब भगवान ने भक्त को अमर कर दिया
मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ। धोबी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी साधना पूर्ण की थी। किन्तु उसके मन में एक अधूरी इच्छा थी — वह काशी की यात्रा करना चाहता था।
वह काशी गया। और काशी में भगवान विश्वनाथ के दर्शन के समय उसे एक असाधारण अनुभव हुआ। भगवान नृसिंह ने वहाँ भी उसे दर्शन दिए और कहा: "तुमने मेरे लिए जो किया, उसका पुण्य काशी-यात्रा से एक गुंजा बीज अधिक है।"
धोबी की आँखों में आँसू थे। वह वापस आया। और उसने भगवान के सामने अंतिम प्रार्थना की।
प्रभु, मेरी एक इच्छा है। मैं और मेरी पत्नी सदा आपके दर्शन करने आने वाले भक्तों के चरणों की धूलि से पवित्र होते रहें।
— धोबी की अंतिम प्रार्थना, भगवान नृसिंह के समक्षभगवान नृसिंह ने वह माँग स्वीकार की। और आज इस मंदिर की देहली पर उस धोबी और उसकी पत्नी की प्रतिमा उत्कीर्ण है। जो भी भक्त मंदिर में प्रवेश करता है, उसके चरण उस धोबी को स्पर्श करते हैं। वह धोबी आज भी प्रतिदिन लाखों भक्तों के चरणों का स्पर्श पा रहा है। यह उस महान भक्त की अमरता है।
गुंजा नाम का रहस्य: वह बीज जिसने काशी को तौला
इस मंदिर का नाम गुंजा नृसिंह क्यों है? इसके दो कारण हैं। पहला: मंदिर के प्रवेश द्वार के समक्ष एक विशाल गुंजा वृक्ष है। गुंजा — जिसे कन्नड़ में गुलगंजी कहते हैं — के लाल और काले बीज प्राचीन काल में सोने की शुद्धता परखने के लिए उपयोग किए जाते थे।
दूसरा और मुख्य कारण: भगवान नृसिंह के गर्भगृह में जो विग्रह है, उनके हाथ में एक तराजू है। उस तराजू के एक पलड़े में गुंजा के बीज की एक टहनी है। यह इस बात का प्रतीक है कि इस मंदिर का पुण्य काशी के पुण्य से एक गुंजा बीज अधिक है। काशी और इस मंदिर को तराजू पर रखें — इस मंदिर का पलड़ा भारी रहेगा। एक बीज के भार से।
यह अहंकार नहीं। यह भगवान का वचन है।
— धर्म यात्राकुम्भ मेला दक्षिण: वह महोत्सव जो तीन वर्षों में एक बार
प्रयाग में हर बारह वर्षों में कुम्भ मेला लगता है। तिरुमकुडलु नरसीपुर में हर तीन वर्षों में एक बार दक्षिण भारत का कुम्भ मेला लगता है। यह परंपरा 1989 से प्रारंभ हुई है। किन्तु इस स्थान का पुण्य उससे कहीं पुराना है।
कुम्भ मेले के समय तीनों नदियों के संगम में स्नान करने वाले भक्तों की संख्या लाखों में होती है। दक्षिण भारत के प्रत्येक कोने से भक्त यहाँ आते हैं। और उस संगम में स्नान के पश्चात गुंजा नृसिंह के दर्शन। यह संयोजन इस स्थान को दक्षिण भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थों में से एक बनाता है।
अगस्त्य ऋषि का मंदिर: वह तथ्य जो गुंजा नृसिंह मंदिर से पुराना है
तिरुमकुडलु नरसीपुर में अगस्त्येश्वर मंदिर है जो गुंजा नृसिंह मंदिर से भी पुराना है। अगस्त्य ऋषि ने स्वयं इस मंदिर की स्थापना की थी — वही अगस्त्य जिन्होंने विन्ध्य पर्वत को झुका दिया था, जिन्होंने समुद्र को पी लिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत में वेदों का प्रसार किया।
अर्थात यह भूमि गुंजा नृसिंह मंदिर के निर्माण से भी पूर्व पवित्र थी। जो भूमि ऋषियों ने पवित्र की हो, वहाँ भगवान का प्रकट होना स्वाभाविक है।
विजयनगर साम्राज्य और कृष्णदेव राय का शिलालेख
गुंजा नृसिंह मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के काल में हुआ। विजयनगर के महान सम्राट कृष्णदेव राय के काल के शिलालेख इस मंदिर में आज भी हैं — नागरी लिपि में। ये शिलालेख उस मंदिर की वैभवशाली परंपरा के साक्षी हैं।
मंदिर की वास्तुकला में द्रविड़ और होयसला दोनों शैलियों का अद्भुत संगम है — एक विशाल गोपुरम, चार स्तम्भों वाला मण्डप, और गर्भगृह में वह असाधारण विग्रह जिसके हाथ में तराजू है। बाद में नालवाड़ी कृष्णराज वाडेयार ने भी इस मंदिर का विस्तार करवाया। दो महान राजवंशों ने इस मंदिर को सजाया — किन्तु यहाँ भगवान एक धोबी के स्वप्न से प्रकट हुए थे।
इस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भगवान साधारण मनुष्य को भी चुनते हैं। धोबी एक साधारण व्यक्ति था — कोई ऋषि नहीं, कोई राजा नहीं। किन्तु भगवान ने उसे ही चुना। उसके स्वप्न में आए। उसे स्वर्ण दिया। उसके हाथों से मंदिर बनवाया। भगवान किसी का पद नहीं देखते — वे हृदय देखते हैं।
दूसरी शिक्षा: भक्त की माँग कितनी विनम्र थी। धोबी ने मोक्ष नहीं माँगा। धन नहीं माँगा। उसने माँगा: "भक्तों के चरण हमें स्पर्श करते रहें।" यह उस भक्त की महानता है जो स्वयं को भक्तों से नीचे रखता है।
तीसरी शिक्षा: जो भगवान के लिए कुछ करता है, उसे भगवान अमर करते हैं। धोबी ने मंदिर बनवाया। भगवान ने उसे देहली पर स्थापित कर दिया। प्रतिदिन लाखों चरणों का स्पर्श — यह वह अमरता है जो किसी और तरीके से नहीं मिलती।
चौथी शिक्षा: गुप्त शक्तियाँ सदा काम करती हैं। स्पटिका सरोवर अदृश्य है किन्तु बह रही है। भगवान की कृपा भी ऐसी ही है — दिखाई न दे, किन्तु वह सदा प्रवाहित होती रहती है।
उपसंहार: वह तराजू जो आज भी झुका है
गर्भगृह में भगवान नृसिंह के हाथ में वह तराजू है। एक पलड़े में गुंजा की टहनी। दूसरे पलड़े में काशी का पुण्य। और गुंजा का पलड़ा भारी है।
यह तराजू केवल काशी और इस मंदिर की तुलना नहीं कर रहा। यह एक संदेश दे रहा है: भगवान के लिए पुण्य का माप बड़ी तीर्थयात्राओं में नहीं, भक्त के हृदय की शुद्धता में है।
उस धोबी ने कोई बड़ी यात्रा नहीं की थी। उसने केवल भगवान का आदेश माना। और भगवान ने उसे काशी से अधिक पुण्य दिया। जो भक्त आज इस मंदिर में आता है, वह उसी धोबी की परंपरा में आता है — और उसी वचन का लाभार्थी बनता है जो भगवान नृसिंह ने उस साधारण धोबी को दिया था।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
मैं उन भगवान नृसिंह को प्रणाम करता हूँ जो उग्र और वीर हैं, महाविष्णु स्वरूप हैं, सर्वत्र प्रकाशमान हैं, भय का नाश करने वाले हैं तथा मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
स्रोत एवं संदर्भ: यह लेख स्कंद पुराण, तिरुमकुडलु नरसीपुर स्थलपुराण परंपरा, तथा विभिन्न धर्म-सांस्कृतिक संदर्भ स्रोतों पर आधारित है।