वह गर्जना जिसने संगीत को जन्म दिया
सतयुग में एक क्षण आया जो सम्पूर्ण सृष्टि के इतिहास में अद्वितीय था।
एक स्तम्भ फटा।
और उस स्तम्भ के फटने की गर्जना इतनी असाधारण थी कि उससे 172 शास्त्रीय रागों का जन्म हुआ।
यह कोई काव्य-अतिशयोक्ति नहीं।
जब भगवान नृसिंह स्तम्भ से प्रकट हुए, उनके उस पहले पग की ध्वनि से 172 स्वर उत्पन्न हुए जो 172 शास्त्रीय रागों के प्रथम आधार-सूत्र हैं। इनमें से केवल 52 मेलकर्ता राग आज उपलब्ध हैं। और उन्हें पूरी तरह सीखना किसी एक मनुष्य के जीवन में सम्भव नहीं।
अर्थात जो संगीत आज सम्पूर्ण भारतीय शास्त्रीय परंपरा में बजता है, उसका उद्गम उस एक क्षण में है जब भगवान नृसिंह उस स्तम्भ से प्रकट हुए थे।
और वह स्तम्भ, वह स्थान, वह गर्भगृह — आज भी यहाँ है।
यह स्थान है: श्री अहोबिल नृसिंह स्वामी मंदिर। ऊपरी अहोबिलम में। नव नृसिंह का मुख्य मंदिर। सबसे प्राचीन। सबसे पवित्र।
आइए, इस महारहस्य को समझते हैं।
नव नृसिंह में प्रथम और मुख्य: वह स्थान जो सबका आधार है
यह मंदिर ऊपरी अहोबिलम के शिखर पर है, निचले अहोबिलम से आठ किलोमीटर दूर। यहाँ भगवान अपने सबसे उग्र स्वरूप में विराजमान हैं — उग्र नृसिंह के रूप में — एक प्राकृतिक गुफा में शालिग्राम रूप में।
यह विग्रह स्वयंभू है। किसी मानव हाथ ने इसे नहीं बनाया।
गर्भगृह एक विशाल अंडाकार शिला को काटकर बनाया गया है। भगवान चक्रासन में विराजित हैं, पूर्व दिशा में मुख किए।
अंडाकार शिला। यह कोई साधारण वास्तु-निर्णय नहीं।
अंड सृष्टि का प्रतीक है। ब्रह्माण्ड का आधार। और उसी अंडाकार शिला में, उसी सृष्टि के केन्द्र में, भगवान नृसिंह विराजमान हैं।
जो सृष्टि के केन्द्र में है, वही समस्त सृष्टि का रक्षक भी है।
— अहोबिलम स्थलपुराणशालिग्राम स्वरूप: वह विग्रह जो स्वयं विष्णु हैं
अहोबिल नृसिंह का विग्रह शालिग्राम रूप में है।
शालिग्राम क्या है?
नेपाल की गण्डकी नदी में पाया जाने वाला एक विशेष पत्थर। उसमें भगवान विष्णु के चक्र के चिह्न होते हैं। शालिग्राम को स्वयं भगवान विष्णु का जीवंत स्वरूप माना जाता है। उसे किसी की प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं।
और यहाँ, इस मुख्य मंदिर में, भगवान उसी शालिग्राम रूप में विराजमान हैं।
वे सुखासन मुद्रा में बैठे हैं और हिरण्यकशिपु की छाती को अपने दिव्य नखों से विदीर्ण कर रहे हैं। सामने प्रह्लाद हैं। और उनके साथ चेंचु लक्ष्मी पद्मासन में विराजमान हैं।
एक ही दर्शन में तीन भाव: भगवान की उग्रता, भक्त की रक्षा और माता का प्रेम।
शिव की उपासना: जब महादेव ने नृसिंह को प्रणाम किया
स्वयं भगवान शिव ने इसी स्थान पर भगवान नृसिंह की उपासना की थी।
यह तथ्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
शिव और विष्णु की परंपराएँ भारत में अलग-अलग मानी जाती हैं। शैव और वैष्णव। किंतु यहाँ, इस स्थान पर, स्वयं शिव ने नृसिंह को प्रणाम किया।
यह उस अद्वैत सत्य का प्रमाण है जो भारतीय दर्शन का मूल है: शिव और विष्णु दोनों एक ही परब्रह्म के रूप हैं।
जब तीनों लोकों में वह असाधारण उग्र स्वरूप प्रकट हुआ, तो देवता, ऋषि और स्वयं शिव सब भयभीत हो गए। और शिव ने उस स्वरूप को प्रणाम करके उसकी स्तुति की।
जिसे महादेव ने प्रणाम किया, उस स्वरूप के दर्शन का माहात्म्य क्या होगा?
— अहोबिलम परंपरावह गर्जना जिसने तीनों लोकों को कँपाया
जब भगवान नृसिंह उस स्तम्भ से प्रकट हुए, उनकी गर्जना इतनी प्रचंड थी कि तीनों लोकों में कंपन उत्पन्न हो गया।
देवताओं ने उस उग्र रूप को देखकर पुकारा।
नारसिंहं परं दैवम् अहोबिलम् अहो बलम्।।
अरे! क्या अद्भुत पराक्रम है! क्या अद्भुत शौर्य है! क्या अद्भुत बल है उन बाहुओं में! नृसिंह सर्वश्रेष्ठ देव हैं! यह गुफा अद्भुत है! यह बल अद्भुत है!
इस स्तुति में जो शब्द आए वही इस स्थान का नाम बना। "अहो बलम्" से अहोबलम। फिर अहोबिलम।
अर्थात इस स्थान का नाम स्वयं एक स्तुति है। एक उद्घोष।
और उसी गर्जना के पहले पग की ध्वनि से 172 शास्त्रीय रागों का जन्म हुआ। जो सम्पूर्ण भारतीय संगीत परंपरा का आधार है।
भगवान ने जब पग रखा, तो संगीत का जन्म हुआ।
— अहोबिलम लोककथाउग्र स्तम्भ: वह पर्वत-शिखर जो स्वयं उस स्तम्भ का अवशेष है
अहोबिलम में उग्र स्तम्भ वह स्थान है जहाँ वह स्तम्भ था जिससे भगवान नृसिंह प्रकट हुए थे।
यह एक पर्वत-शिखर है। जब भगवान उस स्तम्भ से प्रकट हुए, सम्पूर्ण स्तम्भ टुकड़ों में बिखर गया। और वे टुकड़े इस पर्वत-शिखर के रूप में आज भी यहाँ हैं।
उग्र स्तम्भ तक पहुँचना अत्यंत कठिन है। इसका मार्ग ज्वाला नृसिंह मंदिर के निकट से है। यह एक कठिन ट्रेक है और केवल कुछ भक्त ही यहाँ पहुँचने का साहस करते हैं।
किंतु जो पहुँचता है, वह उसी शिखर पर खड़ा होता है जहाँ वह स्तम्भ था।
उग्र स्तम्भ के शिखर पर चैतन्य महाप्रभु के चरण-चिह्न अंकित हैं जो अपनी दक्षिण भारत यात्रा के समय यहाँ आए थे।
और उस गुफा के चारों ओर प्रह्लाद ने स्वयं "ॐ नमो नारायण" और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" लिखा था।
एक स्थान पर तीन युगों की स्मृति: सतयुग में भगवान का प्रकट होना, तब प्रह्लाद का लेखन, और भक्तिकाल में चैतन्य महाप्रभु के चरण।
— अहोबिलम परंपराप्रह्लाद मेट्टु: वह गुफा जो पाठशाला थी
उग्र स्तम्भ और ऊपरी अहोबिलम के बीच पहाड़ी पर एक छोटी गुफा में प्रह्लाद मेट्टु है। यह प्रह्लाद नृसिंह स्वामी को समर्पित है और वह स्थान माना जाता है जहाँ उस छोटे बालक की भक्ति ने भगवान को कर्म के लिए प्रेरित किया।
उस गुफा तक का मार्ग एक संकरे चट्टान-मार्ग से होकर जाता है।
गुफा के भीतर एक कंदरा है। जब असुरों ने प्रह्लाद को पर्वत से फेंका था, वे इसी कंदरा से गिरे और भगवान नारायण ने उन्हें थाम लिया।
और उस गुफा के चारों ओर पत्थरों पर प्रह्लाद ने अपने बचपन में भगवान के नाम लिखे थे।
वे संस्कृत अक्षर आज भी उन शिलाओं पर हैं।
हजारों वर्षों की वर्षा, धूप और काल के बाद भी।
गुरु ग्रह के अधिपति: वह सम्बन्ध जो ज्ञान देता है
नव नृसिंह और नवग्रहों के सम्बन्ध में अहोबिल नृसिंह गुरु ग्रह के अधिपति हैं।
गुरु ज्ञान, विद्या, धर्म और आत्मिक उन्नति का ग्रह है।
और अहोबिल नृसिंह वह स्वरूप हैं जहाँ नृसिंह का मुख्य अवतार हुआ। जहाँ ज्ञान, धर्म और भक्ति की वह परम घटना घटी जिसने सृष्टि को बदल दिया।
जो भक्त ज्ञान और आत्मिक उन्नति के लिए प्रार्थना करते हैं, जो शिक्षा और धर्म के मार्ग पर चलना चाहते हैं, वे अहोबिल नृसिंह की विशेष उपासना करते हैं।
जिस स्वरूप के प्रकट होने से संगीत जन्मा, वह स्वरूप समस्त विद्याओं का उद्गम है।
— अहोबिलम परंपरा9वीं शताब्दी से दर्ज इतिहास: वह साहित्यिक प्रमाण
इस स्थान का सबसे प्रारंभिक साहित्यिक उल्लेख 9वीं शताब्दी के तमिल धार्मिक ग्रंथ "पेरियातिरुमोलि" में है जो तिरुमंगई आलवार ने लिखा था। उस उल्लेख के आधार पर यह 108 दिव्यदेशमों में से एक माना जाता है।
9वीं शताब्दी। 1200 वर्ष पहले।
तब से यह स्थान निरंतर पूजित है। निरंतर जीवंत है।
और उससे पहले के कितने हजार वर्षों की कथा इन पत्थरों में समाई है, वह तो केवल वही जानते हैं जो इन पत्थरों के अंतर्मन में झाँक सकते हैं।
अहोबिलम मठ: वह परंपरा जो 600 वर्षों से जीवित है
अहोबिलम मठ एक महत्त्वपूर्ण श्री वैष्णव धार्मिक संस्था है जिसकी स्थापना लगभग 600 वर्ष पहले हुई थी।
यह मठ आज भी नव नृसिंह मंदिरों की सेवा का प्रबंधन करता है।
इस मठ के जीयर, मालोल नृसिंह की उत्सव मूर्ति लेकर देश-विदेश में यात्रा करते हैं और भगवान का आशीर्वाद भक्तों तक पहुँचाते हैं।
600 वर्षों की वह परंपरा। एक के बाद एक जीयर। और वह उत्सव मूर्ति जो कभी रुकती नहीं।
भगवान अहोबिलम में स्थायी हैं। किंतु उनकी कृपा यात्रा पर है।
— अहोबिलम मठ परंपराइस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भगवान के प्रकट होने से ज्ञान और संगीत का जन्म होता है। वह गर्जना जिससे 172 राग जन्मे। यह बताता है कि भगवान की उपस्थिति केवल शक्ति नहीं लाती, सौंदर्य भी लाती है। ज्ञान भी लाती है। कला भी लाती है।
दूसरी शिक्षा: स्वयंभू विग्रह की असाधारण शक्ति। किसी मानव ने यह विग्रह नहीं बनाया। भगवान स्वयं यहाँ प्रकट हुए। स्वयंभू विग्रह में वह ऊर्जा होती है जो मानव-निर्मित विग्रह में नहीं।
तीसरी शिक्षा: शिव और विष्णु एक हैं। शिव ने यहाँ नृसिंह की उपासना की। यह उस परम सत्य का प्रमाण है कि सभी देव उसी एक परब्रह्म के रूप हैं। भेद केवल उपासना-पद्धति में है, सत्ता में नहीं।
चौथी शिक्षा: भक्त का स्मरण पत्थर में अमर होता है। प्रह्लाद के लिखे अक्षर आज भी उन शिलाओं पर हैं। चैतन्य महाप्रभु के चरण-चिह्न आज भी उस शिखर पर हैं। भगवान अपने भक्त की स्मृति को सदा के लिए अमर कर देते हैं।
उपसंहार: वह स्थान जहाँ सब कुछ आरंभ हुआ
नव नृसिंह की यात्रा में अहोबिल नृसिंह मुख्य हैं क्योंकि यहीं वह महाघटना घटी थी।
यहीं वह स्तम्भ था। यहीं वह गर्जना थी। यहीं वह क्षण था जब प्रह्लाद ने अपने भगवान को साक्षात देखा।
उस अंडाकार शिला में, उस गुफा में, वह स्वयंभू विग्रह आज भी विराजमान है।
उस पहाड़ी इलाके की ऊबड़-खाबड़ चट्टानें, साथ में बहती भवनासिनी नदी, एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जो हजारों वर्षों से तीर्थयात्रियों को कँपा देता है।
यह स्थान केवल एक मंदिर नहीं।
यह वह स्थान है जहाँ परब्रह्म ने अपने भक्त के लिए सृष्टि के सारे नियम तोड़े। जहाँ अधर्म का अंत हुआ। जहाँ संगीत ने जन्म लिया। जहाँ भक्ति ने अपना सर्वोच्च पुरस्कार पाया।
और वह भगवान आज भी उसी अंडाकार गुफा में विराजमान हैं।
वे प्रतीक्षा में हैं।
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
— नृसिंह स्तुति