अहोबिलम के निचले क्षेत्र से तीन किलोमीटर दूर एक पीपल का वृक्ष है। घने काँटेदार झाड़ियों से घिरा। प्राकृतिक वन के बीचों-बीच। उस वृक्ष की छाया में एक विग्रह है — छह फुट ऊँचा। मुख पर एक अत्यंत सुंदर, विस्तृत मुस्कान। ऊपरी हाथों में शंख और चक्र। और बाएँ हाथ में एक ऐसी मुद्रा जो संसार के किसी और नृसिंह विग्रह में नहीं मिलती।
ताल मुद्रा। संगीत की मुद्रा। जैसे कोई ताल दे रहा हो।
यह भगवान हैं: श्री छत्रवट नृसिंह स्वामी। और इस मुद्रा के पीछे एक ऐसी कथा है जो स्वर्ग के दो संगीतकारों, उनकी अद्भुत प्रतिभा, और भगवान के हृदय में संगीत के प्रति उस प्रेम की गवाही देती है जो शायद ही किसी और नृसिंह स्वरूप में दिखता है।
आइए, इस मधुर रहस्य को समझते हैं।
छत्रवट नाम का रहस्य: छत्र और वट का संगम
इस मंदिर के नाम में ही एक सुंदर अर्थ छिपा है। छत्र अर्थात छाता — वह जो ऊपर से आच्छादन करे। वट अर्थात पीपल अथवा वट वृक्ष। छत्रवट का अर्थ है: वह वृक्षों की छतरी जो भगवान को दिव्य छत्र की भाँति आच्छादित करती है।
भगवान यहाँ एक पीपल वृक्ष के नीचे विराजमान हैं। उस वृक्ष की शाखाएँ इतनी विस्तृत हैं कि वे भगवान के ऊपर एक प्राकृतिक छत्र का निर्माण करती हैं।
प्रकृति ने स्वयं भगवान के लिए एक छतरी बनाई। किसी मानव निर्मित गोपुरम की आवश्यकता नहीं। वृक्ष की शाखाएँ ही उनका आवरण हैं।
— छत्रवट माहात्म्ययह दृश्य अत्यंत भावपूर्ण है। भगवान जो सम्पूर्ण सृष्टि के रक्षक हैं, उन्हें यहाँ स्वयं प्रकृति आश्रय दे रही है।
हाहा और हूहू: वे दो गंधर्व जिन्होंने भगवान को मंत्रमुग्ध किया
इस मंदिर की सबसे अद्भुत कथा दो गंधर्वों से जुड़ी है। मेरु पर्वत से दो गंधर्व यहाँ आए। उनके नाम थे: हाहा और हूहू।
गंधर्व स्वर्ग के वे दिव्य प्राणी हैं जो संगीत और कला में निपुण माने जाते हैं। हाहा और हूहू उन गंधर्वों में भी विशेष थे। जब वे इस वन में आए और उन्होंने भगवान छत्रवट नृसिंह को पीपल वृक्ष के नीचे विराजमान देखा, तो उनके हृदय में एक भाव जागा — वे भगवान के लिए गाना चाहते थे।
उन्होंने अपना संगीत आरंभ किया। और वह संगीत इतना मधुर, इतना मनमोहक था कि भगवान नृसिंह, जो हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात उग्रता में थे, उस संगीत में पूर्णतः लीन हो गए। उन्होंने अपने हाथ से ताल देना शुरू किया।
वही ताल जो आज भी उनके विग्रह में अमर है।
ताल मुद्रा: वह स्वरूप जो संसार में अद्वितीय है
छत्रवट नृसिंह के विग्रह की एक विशेषता है जो किसी और नृसिंह स्वरूप में नहीं मिलती। उनका बायाँ हाथ तला मुद्रा अर्थात ताल देने की मुद्रा में है। यह मुद्रा केवल इसी विग्रह में है।
सोचिए उस दृश्य को। भगवान जो अभी एक भयंकर असुर का वध करके आए थे, वे अब संगीत सुनकर इतने प्रसन्न थे कि अपने हाथ से ताल दे रहे थे।
भगवान जो युद्ध में अजेय हैं, वही भगवान संगीत में इतने सरल और सहज हैं कि स्वयं ताल देने लगते हैं।
— छत्रवट स्थलपुराणयह उनकी सर्वव्यापकता का प्रमाण है। वे केवल शक्ति नहीं, सौंदर्य भी हैं। केवल न्याय नहीं, कला भी हैं।
वह वरदान जिसने दो गंधर्वों को अमर बना दिया
जब हाहा और हूहू का संगीत समाप्त हुआ, तो भगवान अत्यंत प्रसन्न थे। उन्होंने दोनों गंधर्वों को आशीर्वाद दिया।
भगवान ने कहा: "तुम दोनों तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ गायक के रूप में प्रसिद्ध होगे।"
यह वरदान साधारण नहीं था। तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ गायक होना — देवलोक, मृत्युलोक और पाताल लोक में जहाँ भी संगीत हो, वहाँ हाहा और हूहू का नाम सबसे ऊपर हो। यह वरदान भगवान ने उन्हें केवल इसलिए दिया क्योंकि उन्होंने अपना संगीत निःस्वार्थ भाव से, केवल भगवान को प्रसन्न करने के लिए गाया था।
सच्ची कला, जो किसी प्रतिफल की आशा के बिना अर्पित की जाए, भगवान को सबसे अधिक प्रसन्न करती है।
— ब्रह्माण्ड पुराणऔर आज भी जो भक्त इस मंदिर में मधुर स्वर में भजन गाते हैं, वे उन्हीं दो गंधर्वों की परंपरा का अनुसरण करते हैं।
देवता आराधना क्षेत्र: जब इंद्र और देवताओं ने यहाँ प्रार्थना की
छत्रवट नृसिंह मंदिर का एक और नाम है: देवता आराधना क्षेत्र। यह नाम क्यों? इंद्र और अन्य देवताओं ने यहाँ छत्रवट नृसिंह की आराधना की और उनसे असुर राजा का वध करने का अनुरोध किया।
अर्थात हिरण्यकशिपु के वध से पहले, इसी स्थान पर, इंद्र सहित सभी देवताओं ने भगवान से प्रार्थना की थी। उन्होंने कहा होगा: "प्रभु, हिरण्यकशिपु के अत्याचार असहनीय हो गए हैं। हमारी रक्षा कीजिए।" और भगवान ने उनकी प्रार्थना सुनी।
यह स्थान केवल संगीत की कथा का साक्षी नहीं। यह वह स्थान भी है जहाँ देवताओं की प्रार्थना ने भगवान को कर्म के लिए प्रेरित किया। देवताओं की प्रार्थना और गंधर्वों का संगीत, दोनों इसी पीपल वृक्ष के नीचे हुए। एक ही स्थान। दो अलग समय। दो अलग भाव।
केतु ग्रह और छत्रवट नृसिंह: वह सम्बन्ध जो शाप से मुक्ति देता है
नव नृसिंह और नवग्रहों के सम्बन्ध में छत्रवट नृसिंह केतु ग्रह के अधिपति हैं। केतु एक छाया ग्रह है — रहस्य, आध्यात्मिकता, मोक्ष और अप्रत्याशित घटनाओं का ग्रह। केतु ने स्वयं अपने शाप से मुक्ति पाने के लिए यहाँ प्रार्थना की थी।
केतु जो स्वयं एक ग्रह है, जो अनेक जीवात्माओं के भाग्य को प्रभावित करता है, उसे भी शाप से मुक्ति चाहिए थी। और उसने यह मुक्ति छत्रवट नृसिंह से माँगी। यह तथ्य बताता है कि भगवान की शरण में देवता, ग्रह, गंधर्व — सभी आते हैं। कोई इतना बड़ा नहीं कि उसे भगवान की कृपा की आवश्यकता न हो।
जो भक्त केतु के दोष से पीड़ित हों, जो कलात्मक और संगीत क्षेत्र में रुचि रखते हों, वे विशेष रूप से छत्रवट नृसिंह की उपासना करते हैं। ललित कला में रुचि रखने वाले लोग सामान्यतः उनके आशीर्वाद के लिए इस मंदिर में आते हैं।
विग्रह की एक और विशेषता: वह उत्सव मूर्ति जिसका रहस्य अनोखा है
छत्रवट नृसिंह के विग्रह की एक और बात ध्यान देने योग्य है। स्तम्भों की शैली के आधार पर यह मंदिर 12वीं शताब्दी का माना जाता है। और प्रधान देवता की प्रतिमा प्रारंभिक विजयनगर काल की है।
12वीं शताब्दी के स्तम्भ। और विजयनगर काल का विग्रह। यह बताता है कि मंदिर का ढाँचा एक काल का है और विग्रह दूसरे काल का। संभवतः मूल विग्रह किसी कारण से बदला गया हो, या समय के साथ नया विग्रह स्थापित हुआ हो। आज यह मंदिर पूर्णतः सीमेंट संरचना में नवीनीकृत है। किंतु वह आत्मा, वह संगीत की स्मृति, वह ताल मुद्रा आज भी वैसी ही है।
अहोबिलम का सबसे सुलभ मंदिर: वह मार्ग जो योगानंद नृसिंह के साथ जुड़ता है
छत्रवट नृसिंह मंदिर निचले अहोबिलम से तीन किलोमीटर दूर है — योगानंद नृसिंह के मार्ग पर ही स्थित। यह मंदिर भी अहोबिलम के अधिक सुलभ मंदिरों में से एक है। प्रातः नौ बजे से सायं साढ़े पाँच बजे तक मंदिर के द्वार खुले रहते हैं, योगानंद मंदिर के साथ ही।
जो भक्त एक ही यात्रा में योगानंद नृसिंह और छत्रवट नृसिंह दोनों के दर्शन करता है, वह एक ही दिन में भगवान के दो अलग भावों का अनुभव करता है। योगानंद नृसिंह में भगवान गुरु हैं। छत्रवट नृसिंह में भगवान श्रोता हैं, रसिक हैं, कला-प्रेमी हैं।
एक ही पथ पर दो भिन्न दर्शन।
— अहोबिलम यात्रा माहात्म्यइस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: निःस्वार्थ कला सबसे बड़ा वरदान पाती है। हाहा और हूहू ने प्रतिफल की आशा के बिना गाया। और उन्हें तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ होने का वरदान मिला। जो कला, जो सेवा निःस्वार्थ भाव से की जाए, वह सबसे बड़ा फल देती है।
दूसरी शिक्षा: भगवान सौंदर्य और कला के भी रसिक हैं। भगवान केवल न्यायकर्ता नहीं। वे संगीत में लीन हो सकते हैं। ताल दे सकते हैं। यह बताता है कि भक्ति केवल कठोर साधना नहीं, आनंदमय अभिव्यक्ति भी हो सकती है।
तीसरी शिक्षा: प्रार्थना का बल असीम है। देवताओं की प्रार्थना ने भगवान को हिरण्यकशिपु के वध के लिए प्रेरित किया। सच्ची प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।
चौथी शिक्षा: प्रकृति भी भगवान की सेवा करती है। वह पीपल वृक्ष जिसने भगवान को छत्र दिया — यह बताता है कि प्रकृति का प्रत्येक तत्त्व भगवान की सेवा के लिए तत्पर है।
उपसंहार: वह ताल जो आज भी सुनाई देती है
उस पीपल वृक्ष की छाया में। काँटेदार झाड़ियों से घिरे उस वन में। भगवान छत्रवट नृसिंह आज भी विराजमान हैं — मुस्कुराते हुए, बाएँ हाथ से ताल देते हुए।
हाहा और हूहू का वह संगीत अब सुनाई नहीं देता। किंतु वह ताल मुद्रा आज भी उसी संगीत की स्मृति को धारण किए हुए है। जो भक्त आज इस मंदिर में आकर मधुर स्वर में भजन गाता है, वह उसी परंपरा को आगे बढ़ाता है जो उन दो गंधर्वों ने स्थापित की थी।
भगवान आज भी उसी प्रसन्नता से सुनते हैं, जैसे उन्होंने त्रेतायुग में हाहा और हूहू का संगीत सुना था।
— छत्रवट भक्त परंपरानृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
मैं उन उग्र, वीर, महाविष्णु, सर्वत्र प्रकाशमान, सब ओर मुख वाले, भयंकर और कल्याणकारी नृसिंह भगवान को नमस्कार करता हूँ — जो स्वयं मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
स्रोत एवं संदर्भ: यह लेख tirupatitirumalainfo.com, templesinindiainfo.com, arunraj.org, divinedarshan.blogspot.com तथा अहोबिलम स्थलपुराण एवं ब्रह्माण्ड पुराण के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है। — 108 Dharma Yatra