तुमकुर जिले में बेंगलुरु से 70 किलोमीटर दूर एक पर्वत है। यह पर्वत साधारण नहीं है। पूर्व से देखो तो यह हाथी जैसा दिखता है। दक्षिण से देखो तो सिंह जैसा। पश्चिम से देखो तो सर्प जैसा। और उत्तर से देखो तो गरुड़ जैसा।
एक ही पर्वत। चार दिशाएँ। चार रूप। हाथी जो भगवान गणेश का वाहन है। सिंह जो नृसिंह का स्वरूप है। सर्प जो आदिशेष है। गरुड़ जो विष्णु का वाहन है। प्रकृति ने स्वयं इस पर्वत को भगवान विष्णु के सम्पूर्ण परिवार से जोड़ा है।
इसीलिए इस पर्वत का नाम है: करिगिरि। करि अर्थात हाथी। गिरि अर्थात पर्वत। और इस पर्वत पर दो मंदिर हैं जो नृसिंह भक्तों के लिए स्वर्ग से कम नहीं। यह स्थान है: देवरायनदुर्ग। देव का दुर्ग। ईश्वर का किला।
देवरायनदुर्ग नाम का इतिहास: तीन नाम, तीन युग
प्राचीन काल में इस स्थान का नाम था: अनेबिड्डसारी — अर्थात वह स्थान जहाँ हाथी गिरा। फिर यहाँ के एक स्थानीय प्रमुख के नाम पर इसे जडकन दुर्ग कहा गया। और जब मैसूर के शासक चिक्क देवराज वाडेयार ने इस स्थान को विजय किया, तब यह देवरायनदुर्ग कहलाया।
किंतु इस नाम में एक और गहरा अर्थ है। जो देवराय अर्थात देवताओं का राजा है, वह स्वयं नृसिंह हैं। और यह उन्हीं का किला है। तीन नाम। तीन काल। किंतु स्वामी एक ही हैं।
ब्रह्मा की 2000 वर्षों की तपस्या: जब सृष्टि के रचयिता ने नृसिंह को पुकारा
इस क्षेत्र की सबसे महत्त्वपूर्ण कथा ब्रह्मा देव से जुड़ी है। द्वापर युग में ब्रह्मा देव इस पर्वत पर आए। और यहाँ 2000 वर्षों तक भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की।
जो सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण करते हैं, जो सृजन की शक्ति हैं, वे यहाँ बैठकर तपस्या कर रहे हैं। और भगवान विष्णु उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए। उन्होंने यहाँ योग नृसिंह के रूप में दर्शन दिए।
ब्रह्मा को नृसिंह के उस दर्शन में माता लक्ष्मी के साथ वह स्वरूप दिखा जो शांत, सौम्य और ध्यानमग्न था। यह पर्वत उस भेंट का साक्षी है। जहाँ ब्रह्मा को दर्शन मिले, वह भूमि साधारण कैसे हो सकती है?
— देवरायनदुर्ग स्थलपुराणदो मंदिर, दो भाव: योग नृसिंह और भोग नृसिंह
देवरायनदुर्ग की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ एक ही पर्वत पर नृसिंह के दो भिन्न स्वरूप हैं।
योग नृसिंह: पर्वत के शिखर पर। शांत, ध्यानमग्न, माता लक्ष्मी के साथ। यह वह स्वरूप है जो ब्रह्मा की तपस्या से प्रकट हुआ। ऊँचाई पर होने से इस मंदिर तक पहुँचना अधिक श्रम का कार्य है।
भोग नृसिंह: पर्वत की तलहटी में। पूर्व दिशा की ओर मुख। द्रविड़ शैली में निर्मित। यहाँ के विग्रह के मुख में दो शालिग्राम हैं — एक विष्णु शालिग्राम और एक नृसिंह शालिग्राम।
शालिग्राम स्वयं भगवान विष्णु का जीवंत स्वरूप माना जाता है। और यहाँ दो शालिग्राम स्वयं भगवान नृसिंह के मुख में विराजमान हैं। भगवान के भीतर भगवान।
दुर्वासा ऋषि और भोग नृसिंह: वह तपस्या जिसने तलहटी को भी पवित्र किया
शिखर पर योग नृसिंह ब्रह्मा की तपस्या से प्रकट हुए। तलहटी पर भोग नृसिंह महर्षि दुर्वासा की तपस्या का फल हैं। दुर्वासा ने यहाँ वर्षों की गहरी तपस्या की। और उनकी साधना के फलस्वरूप भोग नृसिंह यहाँ विराजमान हुए।
दुर्वासा वही ऋषि हैं जो अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध हैं। किंतु जो क्रोध कर सके, वही साधना भी कर सके। और जिसकी साधना सच्ची हो, उसे भगवान मिलते हैं। दुर्वासा की कठोर साधना का फल यह मंदिर है। विग्रह के मुख में दो शालिग्राम — यह दुर्वासा ऋषि का वह उपहार है जो आज भी विग्रह में विद्यमान है।
भगवान राम का वह बाण: जिससे आज भी जल बहता है
भगवान श्रीराम इस पर्वत पर आए थे। उन्हें अपने माथे पर तिलक लगाना था। किंतु जल नहीं था। भगवान राम ने अपना बाण उठाया और एक शिला में बाण मारा। और उस शिला से जल निकल आया।
वह जल आज भी बह रहा है। उसी स्थान से। जिस शिला में राम ने बाण मारा था। उस जल से जो नदी निकली, वह है: जय-मंगली नदी। जय और मंगला तीर्थों का संगम। और उस तीर्थ का नाम है: श्रीपद तीर्थ — जिसमें 108 तीर्थ समाहित हैं।
वह बाण जो राम ने मारा था, वह आज भी जल दे रहा है। हजारों वर्ष बाद भी। भगवान के कार्य का प्रभाव अनंत काल तक रहता है।
— देवरायनदुर्ग माहात्म्य108 तीर्थ और स्वयंभू हयग्रीव: वह रहस्य जो गुफा की दीवार में है
देवरायनदुर्ग के श्रीपद तीर्थ की गुफा की दीवार पर स्वयंभू हयग्रीव विराजमान हैं। हयग्रीव भगवान विष्णु का वह अवतार है जिसका मुख अश्व का है और जो ज्ञान के देवता हैं। छात्र और विद्वान उनकी विशेष उपासना करते हैं।
यह स्वयंभू हयग्रीव गुफा की दीवार में प्रकट हैं — किसी ने नहीं बनाए। और उस श्रीपद तीर्थ में 108 तीर्थ समाहित हैं। 108 तीर्थ एक ही स्थान पर। जो यहाँ स्नान करता है, वह 108 तीर्थों का फल पाता है।
अष्ट अंजनेय, अष्ट शिव और अष्ट विष्णु: वह त्रिकोण जिसके केन्द्र में नृसिंह हैं
दोनों नृसिंह मंदिर तीन अष्टकों के केन्द्र में स्थित हैं। अष्ट अंजनेय — आठ हनुमान क्षेत्र। अष्ट शिव — आठ शिव क्षेत्र। अष्ट विष्णु — आठ विष्णु क्षेत्र। तीनों मण्डल इन मंदिरों को घेरते हैं।
हनुमान, शिव और विष्णु तीनों अपने-अपने आठ क्षेत्रों के साथ इन मंदिरों की परिक्रमा कर रहे हैं। नृसिंह केन्द्र में हैं। सब उनके चारों ओर हैं। यह आध्यात्मिक भूगोल बताता है कि यह क्षेत्र केवल एक मंदिर नहीं, एक सम्पूर्ण आध्यात्मिक नक्षत्र का केन्द्र है।
चोल और विजयनगर: दो महान साम्राज्यों का संरक्षण
भोग नृसिंह मंदिर का निर्माण कांतिरव नरसराज प्रथम ने करवाया था। चोल राजाओं ने इस मंदिर को भरपूर संरक्षण दिया। एपिग्राफिया कर्नाटिका के शिलालेख 41 और 42 बताते हैं कि 1858 में मैसूर के राजा कृष्णराज वाडेयार तृतीय ने इस मंदिर के प्रवेश द्वार और गोपुरम का पुनर्निर्माण करवाया।
दो हजार वर्षों में अनेक राजवंश आए और गए। किंतु नृसिंह इस पर्वत पर अटल रहे।
कर्नाटक का वह छिपा हुआ रहस्य: जो तीर्थयात्री नहीं जानते
यह स्थान बेंगलुरु से केवल 70 किलोमीटर दूर है। किंतु इसकी प्रसिद्धि उस अनुपात में नहीं है जो इसकी दिव्यता के अनुसार होनी चाहिए।
जो खोजता है, उसे मिलता है। यह वह तीर्थ है जो भीड़ से दूर है। जहाँ नृसिंह शांत पर्वत पर, घने वनों में, उन भक्तों की प्रतीक्षा करते हैं जो उन्हें खोजने का कष्ट उठाएँ।
इस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: ब्रह्मा भी तपस्या करते हैं। जो सृष्टि बनाते हैं, वे भी भगवान के लिए तपस्या करते हैं। ज्ञान, शक्ति और पद कुछ भी हो, भगवान की भक्ति से बड़ा कोई कार्य नहीं।
दूसरी शिक्षा: एक पर्वत में चार रूप। वह पर्वत जो हाथी, सिंह, सर्प और गरुड़ चारों दिखाता है — यह बताता है कि एक ही वस्तु को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने पर अलग-अलग सत्य दिखते हैं। भगवान भी ऐसे ही हैं।
तीसरी शिक्षा: राम का बाण आज भी जल देता है। वह बाण जो हजारों वर्ष पहले चला था, वह आज भी जल दे रहा है। भगवान के कार्य का प्रभाव अनंत काल तक रहता है।
चौथी शिक्षा: छिपे हुए तीर्थ भी पवित्र हैं। प्रसिद्धि पवित्रता का मापदण्ड नहीं है। देवरायनदुर्ग कम प्रसिद्ध है किंतु इसकी दिव्यता किसी बड़े तीर्थ से कम नहीं।
उपसंहार: वह पर्वत जो चार रूपों में ईश्वर की व्यापकता बताता है
पूर्व से हाथी। दक्षिण से सिंह। पश्चिम से सर्प। उत्तर से गरुड़। यह पर्वत केवल पत्थर नहीं है। यह भगवान विष्णु के उस सम्पूर्ण परिवार का प्रतीक है जिसमें उनका वाहन, उनकी शेषशय्या, उनका अवतार और उनके भक्त सभी समाहित हैं।
और उस पर्वत के शिखर पर योग नृसिंह शांत बैठे हैं। तलहटी पर भोग नृसिंह भक्तों का स्वागत कर रहे हैं। जो यहाँ आता है, वह ब्रह्मा की उस परंपरा में आता है जिन्होंने 2000 वर्षों की तपस्या की थी।
और जो भगवान ब्रह्मा को मिले थे, वही भगवान आज भी इस पर्वत पर विराजमान हैं। वे प्रतीक्षा में हैं।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
मैं उन उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप, ज्वलंत, सर्वव्यापी, भीषण किंतु कल्याणकारी नृसिंह को प्रणाम करता हूँ — जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
स्रोत एवं संदर्भ: यह लेख srinarasimhakutumbam.org, karnataka.com, tumkur.nic.in, ishtadevata.com, pureprayer.com तथा देवरायनदुर्ग स्थलपुराण के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।