अहोबिलम के नव नृसिंह में एक ऐसा नाम है जो सुनते ही मन में एक प्रश्न जगाता है। मालोल। यह शब्द संस्कृत का नहीं है। यह तमिल और तेलुगु का शब्द है। "मा" अर्थात माता लक्ष्मी। "लोल" अर्थात प्रिय। जो प्रेम करता हो। अर्थात मालोल का अर्थ है: माता लक्ष्मी के प्रिय।
किंतु यह नाम इतना विशेष क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर उस कथा में है जो मालोल नृसिंह मंदिर की जड़ों में है। वह कथा जिसमें माता लक्ष्मी ने एक जनजाति की साधारण कन्या का रूप धारण किया। जिसमें भगवान नृसिंह ने उससे विवाह किया। और जिसके बाद वह ज्वाला जो हिरण्यकशिपु के वध के बाद शांत नहीं हुई थी, अंततः शांत हुई।
हिरण्यकशिपु वध के बाद: वह क्रोध जो शांत नहीं हुआ
हिरण्यकशिपु का वध हो चुका था। प्रह्लाद सुरक्षित था। देवता प्रसन्न थे। तीनों लोकों में उत्सव था। किंतु भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। वह उग्र स्वरूप जो स्तम्भ से प्रकट हुआ था, शांत होने का नाम नहीं ले रहा था।
देवता भयभीत थे। ब्रह्मा और शिव ने प्रयास किए किंतु उस क्रोध को शांत नहीं कर सके। तब माता लक्ष्मी ने एक निर्णय लिया: यदि भगवान का क्रोध शांत करना है, तो उन्हें प्रेम से शांत करना होगा।
माता लक्ष्मी वैकुण्ठ की महारानी हैं। किंतु उन्होंने वह सब छोड़ा। उन्होंने चेंचु जनजाति की एक साधारण कन्या का रूप धारण किया। चेंचु वह जनजाति है जो नल्लमला के उन्हीं वनों में रहती है जहाँ अहोबिलम है।
वह विवाह जो अहोबिलम के वनों में हुआ
माता लक्ष्मी ने चेंचु लक्ष्मी का रूप धारण करके उन्हीं वनों में प्रवेश किया जहाँ भगवान नृसिंह अपने उग्र स्वरूप में विचरण कर रहे थे। भगवान नृसिंह की दृष्टि उस वन-कन्या पर पड़ी। वे जानते थे कि यह माता लक्ष्मी हैं। किंतु उस सरल, निर्मल, वन की सुगंध से भरे उस स्वरूप में।
भगवान नृसिंह ने उस चेंचु लक्ष्मी से विवाह का प्रस्ताव रखा। विवाह हुआ। और विवाह के पश्चात माता लक्ष्मी उनकी बाईं गोद में बैठ गईं।
और उसी क्षण वह क्रोध जो देवताओं से शांत नहीं हुआ था, वह शांत हो गया। प्रेम ने वह किया जो शक्ति नहीं कर पाई। उस विवाह के पश्चात भगवान नृसिंह "मालोल" कहलाए — माता लक्ष्मी के प्रिय।
— अहोबिलम स्थलपुराणमालोल विग्रह: वह मुस्कान जो नव नृसिंह में अद्वितीय है
मालोल नृसिंह के विग्रह की एक विशेषता है जो नव नृसिंह में किसी और मंदिर में नहीं। उनके मुख पर एक अत्यंत सुंदर, विस्तृत मुस्कान है। ज्वाला नृसिंह उग्र हैं। अहोबिल नृसिंह हिरण्यकशिपु का वक्ष विदीर्ण कर रहे हैं। किंतु मालोल नृसिंह मुस्करा रहे हैं।
वह मुस्कान उस संतोष की है जो विवाह के पश्चात आई। इस विग्रह में भगवान पद्मासन में बैठे हैं। उनके पैरों के चारों ओर योगपट्ट बंधा है। और उनके दिव्य नखों से हिरण्यकशिपु का वक्ष विदीर्ण हो रहा है। एक ही विग्रह में दो भाव: हिरण्यकशिपु के प्रति उग्रता और लक्ष्मी के प्रति प्रेम। भगवान एक साथ न्याय और करुणा दोनों हैं।
रक्तकुंड तीर्थ: वह सरोवर जिसका जल आज भी लाल है
मालोल नृसिंह मंदिर के निकट एक छोटा सरोवर है — रक्तकुंड तीर्थ। हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात भगवान नृसिंह ने अपने रक्त-रंजित हाथ इसी सरोवर में धोए थे। और उस दिन से इस सरोवर के चारों ओर लाल रंग के चिह्न दिखाई देते हैं।
किंतु एक आश्चर्य की बात — सरोवर का जल आज भी स्फटिक की भाँति स्वच्छ है और अत्यंत मीठा है। बाहर से लाल। भीतर से निर्मल। अधर्म का संपर्क भी भगवान की कृपा को अशुद्ध नहीं कर सकता।
वह गुफा जहाँ प्रह्लाद ने लिखा: "ॐ नमो नारायण"
मालोल नृसिंह मंदिर के पीछे एक संकरे पर्वत मार्ग से लगभग 400 मीटर वन में जाने पर एक गुफा है। यह वह गुफा है जहाँ जब असुरों ने प्रह्लाद को पर्वत से फेंका था, तब वे इसी गुफा में से गिरे और भगवान नारायण ने उन्हें थाम लिया।
और उस गुफा की शिलाओं पर प्रह्लाद ने स्वयं "ॐ नमो नारायण" और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" लिखा था। वे अक्षर आज भी उन शिलाओं पर दिखाई देते हैं। हजारों वर्षों की वायु, वर्षा और काल के बाद भी वे अक्षर अमिट हैं। प्रह्लाद के हाथ से लिखे भगवान के नाम को काल भी नहीं मिटा सका।
श्रीनिवास आचार्य और उत्सव मूर्ति की अद्भुत कथा
कांचीपुरम में एक युवा शिष्य थे: श्रीनिवास आचार्य। वे केवल 20 वर्ष के थे। एक रात भगवान नृसिंह उनके स्वप्न में आए और कहा: "अहोबिलम जाओ।" वे अहोबिलम पहुँचे। वहाँ भगवान नृसिंह स्वयं एक संन्यासी के रूप में प्रकट हुए और उन्हें नाम दिया: "सतकोप जीयर।"
तब एक और रहस्यमय घटना हुई। सतकोप जीयर को नव नृसिंहों में से एक उत्सव मूर्ति चुननी थी। वे निर्णय नहीं कर पाए। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की। और तब मालोल नृसिंह की उत्सव मूर्ति स्वयं चलकर उनके पास आई।
तब से अहोबिल मठ के जीयर जहाँ भी जाते हैं, मालोल नृसिंह की उत्सव मूर्ति उनके साथ रहती है। भगवान मठ में नहीं बैठे हैं। वे अपने भक्त के साथ यात्रा कर रहे हैं।
— अहोबिल मठ परंपराशुक्र ग्रह और मालोल नृसिंह: वह सम्बन्ध जो ज्योतिष से जुड़ा है
नव नृसिंह और नवग्रहों का एक विशेष सम्बन्ध है। मालोल नृसिंह शुक्र ग्रह के अधिपति हैं। शुक्र प्रेम, सौंदर्य, वैवाहिक सुख और भौतिक समृद्धि का ग्रह है। और मालोल नृसिंह का पूरा प्रसंग प्रेम का प्रसंग है।
मालोल नृसिंह मंदिर में विवाह समारोह करने की परंपरा है। मान्यता है कि यहाँ विवाह करने से दाम्पत्य जीवन सुखी और परिपूर्ण होता है। जहाँ भगवान ने स्वयं विवाह किया, वहाँ विवाह करने वालों को उनका आशीर्वाद मिलता है।
शिव-लिंग से नृसिंह: वह चमत्कार जिसने एक राजा को बदल दिया
मंदिर के निर्माण के लिए एक शिव-भक्त राजा की सहायता चाहिए थी। वह राजा प्रतिदिन सोने का शिव-लिंग बनाता था और ब्राह्मणों को दान करता था। जब वह राजा अहोबिलम के निकट आया, तब एक चमत्कार हुआ — उसके द्वारा बनाए गए सोने के सभी शिव-लिंग नृसिंह विग्रहों में बदल जाते थे।
यह प्रसंग उस अद्वैत सत्य को प्रकट करता है जो भारतीय दर्शन का मूल है: शिव और विष्णु एक ही परब्रह्म के दो रूप हैं। जो शिव के लिए बनाया, वह नृसिंह बन गया। दोनों एक ही हैं।
इस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: प्रेम वह करता है जो शक्ति नहीं कर पाती। देवताओं की शक्ति नृसिंह का क्रोध शांत नहीं कर पाई। माता लक्ष्मी के प्रेम ने किया। जीवन में भी अनेक समस्याएँ हैं जो शक्ति से नहीं, प्रेम से हल होती हैं।
दूसरी शिक्षा: भगवान की उत्सव मूर्ति यात्रा करती है। मालोल नृसिंह की उत्सव मूर्ति जीयर के साथ यात्रा पर रहती है। भगवान मंदिर में बंद नहीं हैं। वे अपने भक्तों के साथ चलते हैं।
तीसरी शिक्षा: प्रह्लाद के अक्षर अमिट हैं। हजारों वर्ष बाद भी "ॐ नमो नारायण" उन शिलाओं पर है। जो भगवान के नाम से लिखा जाए, वह काल से परे हो जाता है।
चौथी शिक्षा: विवाह एक आध्यात्मिक संस्कार है। मालोल नृसिंह का वह विवाह जो वन में चेंचु लक्ष्मी से हुआ, यह बताता है कि विवाह केवल सामाजिक बंधन नहीं, आत्माओं का मिलन है।
उपसंहार: वह मुस्कान जो सब कुछ कह देती है
नव नृसिंह में सबसे उग्र ज्वाला नृसिंह हैं। और सबसे सौम्य मालोल नृसिंह हैं। वही भगवान। वही शक्ति। वही नृसिंह। किंतु प्रेम के स्पर्श से वह उग्रता सौम्यता में बदल गई।
उनके मुख पर वह विस्तृत मुस्कान आज भी है। जो उस विवाह के क्षण में आई थी। जो भक्त उस मुस्कान को देखता है, वह जानता है कि भगवान उससे प्रसन्न हैं।
और उस प्रसन्नता के लिए किसी बड़ी साधना की आवश्यकता नहीं। केवल वही निर्मल प्रेम चाहिए जो चेंचु लक्ष्मी ने दिखाया था।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
मैं उस उग्र, वीर, सर्वव्यापक और दिव्य महाविष्णु नृसिंह को प्रणाम करता हूँ, जो भय का नाश करने वाले, मंगलमय तथा मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
यह लेख अहोबिलम स्थलपुराण, ब्रह्माण्ड पुराण तथा विभिन्न पारंपरिक एवं ऐतिहासिक स्रोतों में वर्णित कथाओं और मान्यताओं पर आधारित है।