आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में एक पहाड़ी है। दूर से देखने पर यह पहाड़ी एक विशाल हाथी के समान दिखती है — घुटनों के बल बैठे हुए हाथी की तरह। इस पहाड़ी पर एक ऐसा मंदिर है जिसके विषय में सुनकर मन में एक ही प्रश्न उठता है: क्या यह संभव है?
यहाँ भगवान नृसिंह को पानकम अर्पित किया जाता है। पानकम अर्थात गुड़, जल और इलायची से बना एक पेय। और भगवान उसे पीते हैं।
शंख से जब पुजारी पानकम भगवान के मुख में डालते हैं तो स्पष्ट गरगराहट की आवाज आती है। जैसे कोई प्राणी तृप्त होकर पी रहा हो। आधा पानकम भगवान पी लेते हैं। आधा वापस आता है। यही प्रसाद के रूप में भक्तों को मिलता है।
और इस पूरी प्रक्रिया में एक और रहस्य है। इतने मीठे पेय के बावजूद मंदिर में कभी एक भी चींटी या मक्खी नहीं दिखती।
यह कोई कथा नहीं। यह प्रतिदिन होता है। लाखों भक्तों के सामने। और विज्ञान के पास इसका उत्तर नहीं है। यह स्थान है: मंगलगिरि। और यह मंदिर है: श्री पनकाल लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर।
वह विग्रह जो संसार में अद्वितीय है: केवल मुख, कोई प्रतिमा नहीं
इस मंदिर की पहली और सबसे अद्भुत विशेषता यह है कि यहाँ भगवान का कोई सम्पूर्ण विग्रह नहीं है। गर्भगृह में केवल भगवान का मुख है। स्वयंभू। 15 सेंटीमीटर चौड़ा, विस्तृत रूप से खुला हुआ।
यह मुख धातु के एक मुखौटे से आच्छादित है। किंतु वह मुखौटा केवल शोभा के लिए है। भीतर वह स्वयंभू मुख है जो सतयुग से यहाँ विद्यमान है।
पनकाल नृसिंह का शाब्दिक अर्थ है: वह नृसिंह जो पानकम पीते हैं। और यह मुख सदा खुला रहता है। सदा तैयार।
जैसे भगवान स्वयं कह रहे हों: "आओ। मैं प्रतीक्षा में हूँ।" भारत में ऐसा कोई और नृसिंह मंदिर नहीं जहाँ भगवान की केवल मुख की उपस्थिति हो।
— मंगलगिरि स्थलपुराणयह स्वरूप किसी मूर्तिकार ने नहीं बनाया। यह स्वयंभू है। प्रकृति ने, अथवा कहें भगवान ने स्वयं इसे यहाँ प्रकट किया।
मंगलगिरि का नाम: माता लक्ष्मी की तपस्या से पड़ा
इस पहाड़ी का मूल नाम था: तोटाद्रि। किंतु जब माता लक्ष्मी ने इस पर्वत पर तपस्या की, तब से यह मंगलगिरि कहलाया। मंगल का पर्वत। शुभ का पर्वत।
शास्त्र और स्थलपुराण बताते हैं कि हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ था। उनके उस उग्र स्वरूप को शांत करने के लिए माता लक्ष्मी ने इसी पर्वत पर तपस्या की। और भगवान ने यहाँ शांत होकर माता लक्ष्मी को दर्शन दिए।
इसीलिए यहाँ भगवान "पनकाल लक्ष्मी नृसिंह" के रूप में पूजित हैं। माता लक्ष्मी की तपस्या का स्मरण सदा के लिए उनके नाम में अंकित है।
ह्रस्व शृंगी की कथा: जो पुत्र पर्वत बन गया
राजा परियात्र के पुत्र का नाम था ह्रस्व शृंगी। वे जन्म से शारीरिक विकलांगता से पीड़ित थे। अपनी स्थिति से मुक्ति पाने के लिए वे अनेक तीर्थों पर गए। अनेक ऋषियों से मार्गदर्शन लिया। अंत में वे मंगलगिरि की इस पहाड़ी पर पहुँचे।
यहाँ उन्होंने तीन वर्षों तक भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। जब राजा परियात्र को ज्ञात हुआ, वे अपने पुत्र को वापस लेने आए। किंतु ह्रस्व शृंगी वापस नहीं जाना चाहते थे।
और तब एक अद्भुत घटना हुई। ह्रस्व शृंगी ने हाथी का रूप धारण किया और भगवान विष्णु का शाश्वत आवास बन गए।
वह पहाड़ी जो दूर से हाथी के समान दिखती है, वह स्वयं ह्रस्व शृंगी हैं। यह पर्वत एक भक्त का शरीर है। और उस भक्त के शरीर पर भगवान विराजमान हैं।
— मंगलगिरि स्थलपुराणयुधिष्ठिर का संकल्प और पाण्डवों का आगमन
सतयुग में प्रकट हुए इस मंदिर से द्वापर युग में पाण्डवों का सम्बन्ध जुड़ा। वनवास के समय पाण्डव इस पवित्र पर्वत पर आए।
युधिष्ठिर को एक दिव्य वाणी सुनाई दी। उन्हें एक विशेष स्थान पर खुदाई करने का निर्देश मिला। युधिष्ठिर ने वह खुदाई करवाई। और उन्हें वह स्वयंभू मुख मिला जो आज भी यहाँ विद्यमान है।
तब भीम के आग्रह पर यहाँ भगवान नृसिंह और माता राजलक्ष्मी के विग्रह स्थापित किए गए। महाभारत के पाण्डव जिस स्थान को पवित्र मानते थे, वह स्थान वास्तव में कितना असाधारण होगा।
वह महारहस्य जिसे विज्ञान नहीं सुलझा पाया: आधा पानकम क्यों वापस आता है?
जब पुजारी शंख से पानकम भगवान के मुख में डालते हैं तो तीन असाधारण बातें होती हैं।
पहली: स्पष्ट गरगराहट की आवाज आती है। जैसे कोई वास्तव में पी रहा हो। और यह आवाज तब तक आती रहती है जब तक पानकम डाला जाता रहता है।
दूसरी: ठीक आधा पानकम भगवान स्वीकार करते हैं। शेष आधा वापस आता है। यह आधा कभी कम नहीं होता, कभी अधिक नहीं होता। सदा ठीक आधा।
तीसरी: इतने मीठे पेय के बावजूद मंदिर में एक भी चींटी या मक्खी नहीं होती।
वैज्ञानिकों ने इसे समझने का प्रयास किया। किंतु वे केवल एक तथ्य बता सके: विजयवाड़ा-गुंटूर का यह क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है और कभी ज्वालामुखीय क्षेत्र था। गुड़ का जल सल्फर यौगिकों को निष्क्रिय करता है। इसलिए पानकम चढ़ाने से ज्वालामुखीय विस्फोट की संभावना कम होती है।
किंतु यह उत्तर उन प्रश्नों का समाधान नहीं करता: गरगराहट की आवाज कहाँ से आती है? आधा ही क्यों वापस आता है? चींटी और मक्खी क्यों नहीं आतीं? विज्ञान के पास इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है। और भक्त कहते हैं: जिस प्रश्न का उत्तर विज्ञान नहीं दे सकता, वह उत्तर श्रद्धा देती है।
— पनकाल नृसिंह स्वामी देवस्थानम्तीन मंदिर, एक पर्वत: मंगलगिरि की त्रिमूर्ति
इस एक पर्वत पर तीन नृसिंह मंदिर हैं।
पहला मंदिर: पर्वत की तलहटी में श्री लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर। यहाँ भगवान का पूर्ण विग्रह है।
दूसरा मंदिर: पर्वत के मध्य में पनकाल नृसिंह स्वामी मंदिर। यहाँ केवल मुख है। यही वह स्थान है जहाँ पानकम का चमत्कार होता है।
तीसरा मंदिर: पर्वत के शिखर पर गण्डाल नृसिंह स्वामी मंदिर। यह मंदिर युधिष्ठिर ने स्थापित किया था। यहाँ पहुँचने के लिए पर्वत की पूरी चढ़ाई करनी होती है।
यह तीन मंदिर एक साथ भगवान नृसिंह के तीन भावों का प्रतीक हैं। तलहटी में सुगम दर्शन। मध्य में रहस्यमय पानकम। और शिखर पर कठिन साधना के बाद का दर्शन। जो जितनी ऊँचाई तय करता है, भगवान उतने निकट मिलते हैं।
नामुचि वध: वह प्रसंग जो मंगलगिरि को और विशेष बनाता है
भगवान नृसिंह ने यहाँ नामुचि नामक असुर का भी वध किया था। हिरण्यकशिपु के वध के अतिरिक्त यह एक और असुर संहार है जो मंगलगिरि की भूमि पर हुआ।
नामुचि के वध के पश्चात भगवान ने इस पर्वत को अपना शांत निवास बनाया। और माता लक्ष्मी की तपस्या के पश्चात यह पर्वत वास्तव में शांत हो गया। मंगलमय हो गया।
यह भूमि केवल तीर्थ नहीं। यह वह रणभूमि है जहाँ भगवान ने अधर्म को समाप्त किया और फिर यहीं रह गए।
भक्त नंगे पाँव चढ़ते हैं: वह परंपरा जो प्रेम का प्रमाण है
मंगलगिरि की एक और विशेषता है जो इस स्थान को और पवित्र बनाती है। अनेक भक्त इस पर्वत पर नंगे पाँव चढ़ते हैं। यह कोई नियम नहीं है। यह श्रद्धा है।
प्रत्येक पग के साथ वे मानते हैं कि वे संसार की चिंताओं को नीचे छोड़ रहे हैं और भगवान के निकट जा रहे हैं। पर्वत का प्रत्येक पत्थर उस भक्त के चरणों को याद रखता है जो भगवान के दर्शन के लिए आया था। जो यात्रा कठिन हो वह यात्रा अर्थपूर्ण होती है।
इस मंदिर से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भगवान भक्त का अर्पण स्वयं स्वीकार करते हैं। पानकम का चमत्कार यह सिद्ध करता है कि भगवान मूर्ति में भी जीवंत हैं। वे केवल प्रतीक नहीं हैं। वे वास्तव में उपस्थित हैं। उपासना स्वीकार करते हैं। प्रसाद लौटाते हैं।
दूसरी शिक्षा: जो आधा वापस आता है वह भक्त का भाग है। भगवान आधा रखते हैं, आधा भक्त को देते हैं। यह इस सत्य का प्रतीक है कि भगवान और भक्त के बीच सब कुछ बँटता है। सुख भी, प्रसाद भी।
तीसरी शिक्षा: भक्त अपना सर्वस्व अर्पित कर सकता है। ह्रस्व शृंगी ने अपना शरीर ही भगवान का आवास बना दिया। यह सर्वोच्च समर्पण है। हम अपना समय, अपनी ऊर्जा, अपना प्रेम अर्पित कर सकते हैं।
चौथी शिक्षा: विज्ञान की सीमाएँ हैं, श्रद्धा की नहीं। जो विज्ञान नहीं समझ सका, वह श्रद्धा ने युगों से जाना है। पानकम का चमत्कार इस सत्य का जीवंत प्रमाण है।
उपसंहार: वह आवाज जो सब कुछ कह देती है
कल्पना कीजिए। आप उस गर्भगृह में हैं। पुजारी शंख में पानकम भरते हैं। और उसे उस खुले मुख में डालते हैं।
और तब वह आवाज आती है। गरगराहट। एक जीवंत प्राणी के पीने की आवाज।
उस आवाज को सुनकर कोई संशय नहीं रहता। कोई प्रश्न नहीं रहता। वह आवाज स्वयं उत्तर है।
जो युगों से पूछा जाता रहा है: क्या भगवान हैं? क्या वे सुनते हैं? क्या वे स्वीकार करते हैं? मंगलगिरि में वह आवाज प्रतिदिन उत्तर देती है — हाँ। हूँ। सुनता हूँ। स्वीकार करता हूँ।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
मैं उन उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप, ज्वलंत, सर्वव्यापी, भीषण किंतु कल्याणकारी नृसिंह को प्रणाम करता हूँ — जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
स्रोत एवं संदर्भ: यह लेख श्री पनकाल नृसिंह स्वामी देवस्थानम् (panakalanarasimhaswamy.org), BhaktiBharat.com, famoustemplesofindia.com तथा मंगलगिरि स्थलपुराण के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।