तेलंगाना के सूर्यपेट जिले में कृष्णा नदी के तट पर एक वन है। घना। शांत। और रहस्यमय। इस वन के भीतर एक गुफा है। उस गुफा में एक स्वयंभू विग्रह है — केवल एक फुट ऊँचा, पद्मासन में विराजित, शंख और चक्र धारण किए।
यह भगवान नृसिंह हैं। योगानंद लक्ष्मी नृसिंह।
किंतु इस विग्रह की विशेषता केवल उसका स्वयंभू होना नहीं है। इस विग्रह के बाईं ओर तीन नामम और दो नेत्र उत्कीर्ण हैं। शास्त्र और परंपरा यह मानती है कि वे नेत्र और नामम स्वयं प्रह्लाद का स्वरूप हैं।
अर्थात जो भक्त इस गुफा में नृसिंह का दर्शन करने आता है, उसे एक ही दृश्य में दो दर्शन मिलते हैं — भगवान का और उनके सबसे प्रिय भक्त का।
और इस विग्रह के चरणों में एक एक-फुट लंबी आयताकार शिला है। उस शिला का नाम है: चक्री। यह स्थान है: मट्टपल्ली। पंच नृसिंह क्षेत्रों में से एक।
एकमेव तत्त्वम् मट्टपल्ली नाथम्, न अन्यत् तत्त्वम् पल्ली सिंह तुल्यम्॥
मट्टपल्ली जैसा एकमात्र क्षेत्र है, मट्टपल्ली के समान कोई अन्य क्षेत्र नहीं। मट्टपल्ली के नाथ — पल्ली सिंह — जैसा एकमात्र तत्त्व है, उनके समान कोई अन्य तत्त्व नहीं।
भारद्वाज ऋषि: वह साधक जिसने युगों पहले इस गुफा को जाना
मट्टपल्ली के स्थलपुराण के अनुसार, महर्षि भारद्वाज ने सर्वप्रथम कृष्णा नदी के तट पर इस प्राकृतिक गुफा में भगवान नृसिंह के स्वयंभू विग्रह को प्रकट पाया।
यह वही भारद्वाज ऋषि हैं जो महाभारत और रामायण दोनों में वर्णित हैं। जिनका आश्रम प्रयाग में था। जिन्होंने भगवान राम को वनवास के समय आशीर्वाद दिया था।
ऋषि भारद्वाज और उनके शिष्य इस गुफा में नृसिंह की उपासना करते थे। वर्षों तक। युगों तक। किंतु भारद्वाज ऋषि ने अपने शिष्यों को एक भविष्यवाणी दी: "भगवान तब प्रकट होंगे जब पाप और अन्याय जीवन का नियम बन जाएगा।"
यह भविष्यवाणी कलियुग के लिए थी। और वह समय आया।
प्रह्लाद की तपोभूमि: वह सम्बन्ध जो इस क्षेत्र को अद्वितीय बनाता है
भक्त प्रह्लाद, जो नृसिंह के सबसे प्रिय भक्त हैं, ने इसी स्थान पर उपासना की थी। यह तथ्य इस क्षेत्र को समस्त नृसिंह क्षेत्रों में विशेष बनाता है।
अहोबिलम में हिरण्यकशिपु का वध हुआ। यदाद्रि में यदारिशि ने तपस्या की। किंतु मट्टपल्ली वह भूमि है जहाँ प्रह्लाद स्वयं आए और उपासना की।
जो बालक हिरण्यकशिपु के अत्याचारों से बचा। जिसके लिए नृसिंह स्तम्भ को फाड़कर प्रकट हुए। जिसके प्रेम ने भगवान को अवतार लेने पर विवश किया — उसी प्रह्लाद ने इस गुफा की भूमि को अपने चरणों से पवित्र किया।
और भगवान ने प्रह्लाद को इतना प्रेम किया कि इस विग्रह में उनके नेत्र और नामम सदा के लिए उत्कीर्ण हो गए। जो यहाँ नृसिंह का दर्शन करता है, वह प्रह्लाद की उपस्थिति भी अनुभव करता है।
— मट्टपल्ली स्थलपुराणचक्री की कथा: जिसे भगवान ने मुक्ति देने से इनकार किया
यह प्रसंग अत्यंत विचित्र और हृदयस्पर्शी है।
भगवान नृसिंह के चरणों में जो एक फुट लंबी आयताकार शिला है, वह "चक्री" नामक भक्त का स्वरूप है। चक्री ने भगवान से मुक्ति का वरदान माँगा था। किंतु भगवान ने उसे मुक्ति देने से इनकार किया।
क्यों? क्योंकि भगवान उससे अलग नहीं होना चाहते थे।
चक्री इतना प्रिय भक्त था कि भगवान ने कहा: "मुक्ति मिलेगी तो तुम मुझसे अलग हो जाओगे। यह मुझे स्वीकार नहीं।" इसलिए उन्होंने चक्री को शिला-रूप में अपने चरणों में स्थापित कर लिया। और आज भी उस शिला का प्रतिदिन अभिषेक किया जाता है।
भगवान भक्त की सेवा करते हैं। प्रह्लाद के लिए अवतार लिया। चक्री को अपने चरणों में बसाया। यह भक्ति का वह पक्ष है जो शास्त्र बार-बार कहते हैं: जो भगवान को प्रेम करता है, भगवान उसे छोड़ना नहीं चाहते।
— मट्टपल्ली माहात्म्यराजा मची रेड्डी और स्वप्नादेश: जब भगवान ने स्वयं बताया "मैं यहाँ हूँ"
यदाद्रि की भाँति मट्टपल्ली में भी वह समय आया जब यह क्षेत्र वनस्पतियों और झाड़ियों में छिप गया। भारद्वाज ऋषि और उनके शिष्यों के जाने के बाद यह गुफा विस्मृत हो गई।
तब कलियुग में भगवान ने ठंगेदा के शासक अनुमाला मची रेड्डी को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा: "मैं मट्टपल्ली की गुफा में हूँ। मेरी पूजा करो।"
राजा जागे। उन्होंने तत्काल अपने सेवकों को भेजा। राजा के पंडितों ने कृष्णा नदी के तट की सभी गुफाओं में खोज की। किंतु वे भगवान का विग्रह नहीं ढूँढ पाए। निराश और थके हुए राजा वन में ही सो गए।
भगवान फिर स्वप्न में आए। उन्होंने कहा: "तुम लगभग सही स्थान पर हो। गुफा वनस्पतियों और झाड़ियों से ढकी है।"
राजा उठे। उन्होंने उस क्षेत्र में झाड़ियाँ हटवाईं। और गुफा मिली। राजा ने उस विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई और मंदिर का निर्माण करवाया। यह 11वीं शताब्दी की बात है।
वह रहस्य जो मट्टपल्ली को सबसे अलग बनाता है: परिक्रमा पथ का अभाव
प्रत्येक मंदिर में गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा पथ होता है। यह सनातन परंपरा है। किंतु मट्टपल्ली में गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा पथ नहीं है।
यह विशेषता मट्टपल्ली को तेलंगाना के अन्य नृसिंह मंदिरों से पूर्णतः अलग बनाती है। कारण सरल है: गर्भगृह स्वयं एक प्राकृतिक गुफा है। चारों ओर पर्वत की शिला है। परिक्रमा संभव नहीं।
इसलिए भक्त परिक्रमा के लिए मंदिर के ध्वजस्तम्भ की परिक्रमा करते हैं अथवा उस हनुमान विग्रह की परिक्रमा करते हैं जो स्वयं भगवान योगानंद नृसिंह के सम्मुख विराजित हैं।
हनुमान जी यहाँ भी नृसिंह के सामने हैं। जैसे यदाद्रि में हनुमान जी ने यदारिशि को मार्ग दिखाया, वैसे ही यहाँ हनुमान जी की परिक्रमा नृसिंह की सेवा का विकल्प है। दोनों भक्त एक दूसरे की स्तुति करते हैं। और भगवान दोनों को अपने पास रखते हैं।
औरंगज़ेब की सेना और दिव्य भ्रमर: वह दिन जब भगवान ने अपनी रक्षा स्वयं की
यह प्रसंग मट्टपल्ली के इतिहास का सबसे रोमांचकारी अध्याय है।
मुगल सम्राट औरंगज़ेब के शासनकाल में उसकी सेना ने मट्टपल्ली मंदिर पर आक्रमण किया। उस समय एक परम भक्त महिला थीं: चेन्नुरी गिरम्मा। वे मट्टपल्ली नृसिंह की अनन्य उपासिका थीं।
जब मुगल सेना मंदिर पर आक्रमण करने आई, तो गिरम्मा ने भगवान से प्रार्थना की। और तब जो हुआ, वह इतिहास में दर्ज हो गया।
भगवान नृसिंह ने असंख्य भ्रमर — मधुमक्खियों — को प्रकट किया। उन भ्रमरों ने मुगल सैनिकों पर आक्रमण किया और उन्हें मंदिर से दूर भगा दिया। मंदिर नष्ट होने से बच गया।
जैसे उन्होंने प्रह्लाद की रक्षा की। जैसे दक्षिण अफ्रीका में उस बालिका की रक्षा की। वैसे ही उन्होंने अपनी इस गुफा की रक्षा की। भगवान नृसिंह अपने भक्तों और अपने क्षेत्र के शाश्वत रक्षक हैं।
— मट्टपल्ली स्थलपुराण32 बार गीली परिक्रमा: वह साधना जो समस्याएँ हरती है
मट्टपल्ली की एक और विशेषता है जो श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत प्रसिद्ध है। यहाँ यह मान्यता है कि जो भक्त 11 दिनों तक मट्टपल्ली में रहकर कृष्णा नदी में स्नान करके गीले वस्त्रों में ही दिन में दो बार 32 परिक्रमाएँ करे, उसकी समस्याएँ दूर होती हैं।
यह साधना कठिन है। किंतु इसका फल अद्भुत माना जाता है। कृष्णा नदी का शीतल जल। गीले वस्त्र। 11 दिन की निष्ठा। और प्रतिदिन 64 परिक्रमाएँ।
यह केवल शारीरिक परिश्रम नहीं। यह मन को साधना का अभ्यास है। जो इस साधना को पूर्ण कर लेता है, वह केवल शरीर से नहीं, मन से भी कृष्णा में स्नान कर चुका होता है।
गर्भगृह का रहस्य: वह शिला जो स्वयं आदिशेष है
मट्टपल्ली के गर्भगृह की छत स्वयं एक विशाल शिला है। यह कोई निर्मित संरचना नहीं, यह प्राकृतिक पर्वत शिला है।
और उस शिला के विषय में एक और रहस्य है। भगवान के विग्रह के ऊपर एक शिला उसी प्रकार फैली है जैसे आदिशेष अपने फन से भगवान को छाया देते हैं।
अर्थात प्रकृति ने स्वयं इस गुफा को इस प्रकार निर्मित किया कि भगवान के ऊपर की शिला सर्प के फन के समान है। जैसे क्षीरसागर में शेषनाग पर विष्णु विराजमान हैं, वैसे ही इस गुफा में पर्वत की शिला उनकी छत्र-छाया बनी है। यहाँ भी वही व्यवस्था है जो वैकुण्ठ में है।
इस क्षेत्र से क्या सीखें: चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भगवान छिपते नहीं, हम ढूँढते नहीं। भगवान भारद्वाज ऋषि के समय से इस गुफा में थे। जब खोजने वाला नहीं था, वे झाड़ियों में ढके रहे। जब मची रेड्डी ने खोजा, भगवान स्वयं स्वप्न में आए और बताया। भगवान हमेशा तैयार हैं। हम तैयार हों, यह आवश्यक है।
दूसरी शिक्षा: मुक्ति से बड़ा भगवान का प्रेम है। चक्री ने मुक्ति माँगी। भगवान ने इनकार किया — क्योंकि मुक्ति से भी बड़ा उनका प्रेम था। जो भक्त भगवान से प्रेम करता है, भगवान उसे छोड़ना नहीं चाहते।
तीसरी शिक्षा: भगवान अपने क्षेत्र की रक्षा स्वयं करते हैं। औरंगज़ेब की विशाल सेना को भ्रमरों ने भगाया। एक भक्त की प्रार्थना पर्याप्त थी। भगवान को किसी सेना की आवश्यकता नहीं। वे स्वयं अपने भक्तों और अपने क्षेत्र के रक्षक हैं।
चौथी शिक्षा: भगवान निकट हैं, सदा। प्रह्लाद के नेत्र इस विग्रह में उत्कीर्ण हैं। चक्री उनके चरणों में है। भारद्वाज ने युगों पहले यहाँ तपस्या की। यह सब एक ही सत्य बताता है: भक्त और भगवान का सम्बन्ध अमर है।
उपसंहार: वह गुफा जो प्रतीक्षा कर रही है
मट्टपल्ली की वह गुफा आज भी वैसी ही है। वही कृष्णा का जल। वही पर्वत की शिला। वही स्वयंभू विग्रह।
और उस विग्रह के बाईं ओर आज भी वे नेत्र हैं जो प्रह्लाद के हैं। और चरणों में वह शिला है जो चक्री है।
जो इस गुफा में जाता है, वह अकेला नहीं होता। वह भारद्वाज ऋषि की साधना-भूमि पर होता है। वह प्रह्लाद की तपोभूमि पर होता है। वह उस क्षेत्र में होता है जहाँ भगवान ने स्वयं कहा था: "मैं यहाँ हूँ।"
और वे आज भी वहाँ हैं।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
मैं उन उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप, ज्वलंत, सर्वव्यापी, भीषण किंतु कल्याणकारी नृसिंह को प्रणाम करता हूँ — जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
स्रोत एवं संदर्भ: यह लेख मट्टपल्ली स्थलपुराण, श्री नृसिंह कुटुम्बम् (srinarasimhakutumbam.org), तीर्थयात्रा.org तथा तेलंगाना के प्राचीन वैष्णव मंदिर परंपरा के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।