विशाखापत्तनम से दस मील उत्तर में एक पहाड़ी है। समुद्र तल से आठ सौ मीटर ऊँची। घने वनों से आच्छादित। पूर्वी घाट की उस पर्वत शृंखला का भाग जिसे कैलास कहते हैं। उस पहाड़ी के शिखर पर एक मंदिर है।
और उस मंदिर के गर्भगृह में एक विग्रह है जो पूरे भारत में अद्वितीय है। यह विग्रह वर्ष के 364 दिन चंदन के लेप से ढका रहता है। केवल एक दिन — अक्षय तृतीया को — इस चंदन लेप को हटाया जाता है और भगवान का असली स्वरूप केवल 12 घंटे के लिए दर्शनीय होता है।
वह एक दिन लाखों भक्त यहाँ आते हैं। वह एक दिन जिसकी प्रतीक्षा पूरा वर्ष होती है। वह एक दिन जब भगवान वराह लक्ष्मी नृसिंह अपने निज रूप में दर्शन देते हैं।
यह स्थान है: सिंहाचलम। सिंह का पर्वत। सिंहाद्रि।
प्रह्लाद ने बनवाया यह मंदिर: वह इतिहास जो सत्ययुग से आरंभ होता है
यह वह पवित्र भूमि है जहाँ भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार लेकर प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु से बचाया था। जहाँ भगवान ने प्रह्लाद की रक्षा के लिए धरती पर पाँव रखा, वह स्थान सिंहाचलम कहलाया।
और प्रह्लाद ने स्वयं इस स्थान पर भगवान नृसिंह को समर्पित यह मंदिर बनवाया था। यह तथ्य सिंहाचलम को समस्त नृसिंह क्षेत्रों में विशेष बनाता है।
अहोबिलम वह स्थान है जहाँ नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किया। मट्टपल्ली वह स्थान है जहाँ प्रह्लाद ने साधना की। किंतु सिंहाचलम वह स्थान है जहाँ प्रह्लाद ने स्वयं मंदिर बनवाकर भगवान की प्रतिष्ठा की।
जो बालक भगवान के लिए अग्नि में कूदा, सर्पों के बीच गया, पर्वत से फेंका गया — उसी बालक ने वयस्क होकर उन्हीं भगवान के लिए इस पर्वत पर मंदिर बनवाया। यह भक्ति का वह प्रतिदान है जो जीवन भर चलता है।
— सिंहाचलम स्थलपुराणवराह और नृसिंह एक साथ: वह स्वरूप जो संसार में दुर्लभ है
सिंहाचलम का विग्रह किसी सामान्य नृसिंह विग्रह जैसा नहीं है। यहाँ भगवान "वराह लक्ष्मी नृसिंह" के रूप में विराजमान हैं। यह स्वरूप अत्यंत विशेष है: वराह का शीश, मानव का धड़ और नृसिंह की पुच्छ। यह अष्टभुज विग्रह है जिसमें चक्र, शंख, गदा, पद्म, खड्ग और हल धारण किए हुए हैं।
किंतु यह स्वरूप इस प्रकार क्यों है? शास्त्र और परंपरा बताती है कि हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनके उस उग्र स्वरूप को शांत करने के लिए भगवान ने वराह स्वरूप में माता लक्ष्मी के साथ प्रकट होकर उन्हें सांत्वना दी। इस प्रकार वराह और नृसिंह दोनों स्वरूप एक ही विग्रह में समाहित हो गए।
यहाँ भगवान का क्रोध और करुणा दोनों एक साथ हैं। उग्रता और सौम्यता एक साथ हैं। वराह का पृथ्वी-रक्षक स्वभाव और नृसिंह की भक्त-रक्षक शक्ति एक साथ हैं। यह विग्रह भगवान के समस्त भावों की एकता का प्रतीक है।
चंदन लेप का रहस्य: वह परंपरा जिसके पीछे एक दिव्य आदेश है
अब उस प्रश्न पर आते हैं जो हर भक्त के मन में होता है — यह विग्रह चंदन से क्यों ढका रहता है?
एक बार राजा पुरूरवा अपनी पत्नी उर्वशी के साथ आकाशमार्ग से यात्रा कर रहे थे। दक्षिण की पहाड़ियों के ऊपर से गुजरते समय वे एक रहस्यमय शक्ति से सिंहाचलम की ओर खिंचे चले गए। उन्होंने मालती वृक्षों के एक उद्यान में वह दिव्य विग्रह खोजा और चारों ओर की मिट्टी हटाई।
तभी आकाशवाणी हुई: "इस विग्रह को चंदन से ढककर पूजो और वर्ष में केवल एक बार चंदन यात्रा के दिन इसे उजागर करो।" राजा ने उस आदेश का पालन किया।
इस परंपरा के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक कारण भी है। यह परंपरा इस सत्य का प्रतीक है कि भगवान अपनी उग्र शक्ति को भक्तों के कल्याण के लिए नियंत्रित करते हैं। चंदन शीतल होता है। वह उस ऊर्जा को शांत करता है जो साधारण भक्तों के लिए असह्य हो सकती है।
और इस चंदन लेप के कारण वह विग्रह पूरे वर्ष एक शिवलिंग जैसा दिखता है। इस प्रकार यह मंदिर शैव और वैष्णव परंपराओं के मिलन का प्रतीक भी बन जाता है।
— सिंहाचलम स्थलपुराणनिजरूप दर्शन: वह 12 घंटे जिनके लिए लाखों भक्त वर्षभर प्रतीक्षा करते हैं
वर्ष में एक बार अक्षय तृतीया को — जो वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को पड़ती है — इस विग्रह से चंदन लेप हटाया जाता है।
इस उत्सव का नाम है: चंदनोत्सव अथवा चंदन यात्रा। और उस दिन के दर्शन को कहते हैं: निजरूप दर्शन।
निज का अर्थ है: अपना। असली। वास्तविक। अर्थात उस दिन भगवान अपने असली, वास्तविक स्वरूप में दर्शन देते हैं। उस दिन संध्याकाल में चंदनाभिषेक और सहस्रकलशाभिषेक सहित अनेक स्नान सेवाएँ की जाती हैं।
उस दिन सिंहाचलम पर्वत पर जो वातावरण होता है, वह अवर्णनीय है। लाखों भक्त। हजारों दीपों का प्रकाश। वेदमंत्रों की गूँज। और उस सब के बीच, गर्भगृह में, भगवान वराह लक्ष्मी नृसिंह का वह स्वरूप जो 364 दिनों से छिपा था।
वह दृश्य उन्हें देखना होता है जिनके हृदय में नृसिंह हैं।
पुरूरवा की कथा: जब एक राजा आकाश से खिंचकर आया
पुरूरवा एक पराक्रमी राजा थे। उनकी पत्नी उर्वशी थीं जो एक दिव्य अप्सरा थीं। एक दिन वे दोनों आकाशमार्ग से यात्रा कर रहे थे — और तभी एक रहस्यमय शक्ति ने उन्हें सिंहाचलम की ओर खींचा।
वे उस शक्ति को रोक नहीं पाए। पहाड़ी पर उतरे। और तब उन्हें मालती वृक्षों के उस उद्यान में वह दिव्य विग्रह मिला जो भूमि में समाया हुआ था।
पुरूरवा स्वयं नहीं आए। भगवान ने उन्हें खींचा। यह संयोग नहीं था। भगवान उस व्यक्ति को ढूँढ रहे थे जो उनकी इस परंपरा को पुनः स्थापित कर सके। भगवान सदा अपने सेवकों को खोजते हैं।
— सिंहाचलम माहात्म्यसिंहाचलम की वास्तुकला: तीन शैलियों का अद्भुत संगम
यह मंदिर 9वीं या 10वीं शताब्दी में निर्मित हुआ और 13वीं शताब्दी में इसका विस्तृत पुनर्निर्माण हुआ। इस मंदिर की वास्तुकला उड़ीसा की कलिंग शैली, चालुक्य शैली और चोल शैली का अद्भुत संगम है।
तीन भिन्न-भिन्न राजवंश, तीन भिन्न-भिन्न काल, तीन भिन्न-भिन्न शैलियाँ। किंतु परिणाम एक ऐसा मंदिर जो इन तीनों की श्रेष्ठता को एक साथ समेटे हुए है।
मंदिर की दीवारों पर रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और नृसिंह पुराण के प्रसंगों का विस्तृत शिल्पांकन है। अर्थात यह केवल एक मंदिर नहीं। यह पत्थर में लिखा हुआ शास्त्र है।
वह तथ्य जो कम लोग जानते हैं: सिंहाचलम और 18 नृसिंह क्षेत्र
सिंहाचलम भारत के 18 नृसिंह क्षेत्रों में से एक है। और 32 पवित्र नृसिंह क्षेत्रों में भी इसकी गणना होती है। किंतु इन सभी क्षेत्रों में सिंहाचलम एकमेव है।
क्योंकि किसी और नृसिंह क्षेत्र में यह परंपरा नहीं है कि भगवान का विग्रह पूरे वर्ष ढका रहे और केवल एक दिन दर्शनीय हो। यह परंपरा सिंहाचलम को नृसिंह क्षेत्रों के मध्य भी अद्वितीय बनाती है।
राजा कृष्णदेव राय और सिंहाचलम: विजयनगर साम्राज्य का आशीर्वाद
सिंहाचलम का इतिहास विजयनगर साम्राज्य से भी जुड़ा है। विजयनगर के महान सम्राट श्रीकृष्णदेव राय की पत्नी ने भगवान नृसिंह को बहुमूल्य मोतियों की मालाएँ और आभूषण अर्पित किए थे।
कलिंग, चालुक्य, चोल और विजयनगर। एक के बाद एक राजवंश। सबने इस मंदिर को संरक्षण दिया, सजाया, बनवाया। भगवान का जो स्थान भक्तों के हृदय में होता है, वही स्थान राजाओं के राजकोष में भी होता था।
सिंहाचलम से तीन शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: जो छिपा है वह नष्ट नहीं हुआ। भगवान का विग्रह 364 दिन चंदन से ढका रहता है। दिखाई नहीं देता। किंतु वह वहाँ है। सजीव है। सक्रिय है। जीवन में भी ऐसे समय आते हैं जब भगवान की कृपा दिखाई नहीं देती — किंतु वह है। वह सदा है।
दूसरी शिक्षा: एक पल की प्रतीक्षा वर्षभर की साधना से होती है। जो भक्त उस एक दिन के निजरूप दर्शन के लिए वर्षभर प्रतीक्षा करता है, उसकी श्रद्धा वर्षभर में परिपक्व होती है। वह दर्शन उसे उस परिपक्व श्रद्धा के साथ मिलता है। भगवान की प्रतीक्षा व्यर्थ नहीं जाती। वह हमें तैयार करती है।
तीसरी शिक्षा: भगवान सदा आकर्षित करते हैं। पुरूरवा को किसी ने नहीं बताया कि सिंहाचलम पर एक दिव्य विग्रह है। भगवान ने स्वयं उन्हें खींचा। जो भक्त भगवान की ओर एक कदम बढ़ाता है, भगवान उसकी ओर सहस्र कदम आते हैं।
उपसंहार: वह एक दिन जो सब बदल देता है
अक्षय तृतीया की वह भोर। लाखों भक्त। सिंहाचलम की वे पहाड़ियाँ। वेदमंत्र। दीपों का प्रकाश।
और गर्भगृह में, उस चंदन लेप के हटते ही, वह अष्टभुज स्वरूप। वराह का शीश। मानव का धड़। नृसिंह की शक्ति। और माता लक्ष्मी की करुणा।
वह 12 घंटे। जो उन्हें देखता है, वह जानता है कि उसने कुछ ऐसा देखा जो पूरे वर्ष किसी ने नहीं देखा। और जो इस वर्ष नहीं देख पाया, वह अगले वर्ष की प्रतीक्षा में साधना करता है।
यही सिंहाचलम का महारहस्य है। भगवान छिपते हैं ताकि हम खोजें। और जब मिलते हैं, तो वह मिलन अमर हो जाता है।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
मैं उन उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप, ज्वलंत, सर्वव्यापी, भीषण किंतु कल्याणकारी नृसिंह को प्रणाम करता हूँ — जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
स्रोत एवं संदर्भ: यह लेख श्री वराह लक्ष्मी नृसिंह देवस्थानम् सिंहाचलम, BhaktiBharat.com तथा सिंहाचलम स्थलपुराण के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।