अहोबिलम की पहाड़ियों पर एक पल था जो सम्पूर्ण सृष्टि के लिए असाधारण था। कुछ ही देर पहले वहाँ एक महायुद्ध हुआ था। हिरण्यकशिपु का वध हो चुका था। रक्त था। उग्रता थी। तीनों लोकों में उस क्षण का कंपन था।
और फिर सब शांत हो गया। जब वह भयंकर संहार समाप्त हुआ और ब्रह्माण्ड में शांति लौटी, तब भगवान नृसिंह छोटे प्रह्लाद के साथ बैठे और उन्हें अनेक योगासन और ध्यान की विधियाँ सिखाईं।
एक पल पहले जो हाथ हिरण्यकशिपु की छाती में थे, वही हाथ अब एक बालक को योग की मुद्राएँ दिखा रहे थे। एक पल पहले जो नेत्र क्रोध से जल रहे थे, वही नेत्र अब अपने प्रिय भक्त को देखकर मुस्करा रहे थे। यह परिवर्तन ही योगानंद नृसिंह का महारहस्य है। यह है: श्री योगानंद लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर।
योगानंद नाम का रहस्य: दो शब्दों में एक दर्शन
"योग" अर्थात वह विद्या जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है। "आनंद" अर्थात वह परमानंद जो उस मिलन से उत्पन्न होता है। योगानंद का अर्थ है: योग के माध्यम से आनंद। और इस रूप में भगवान परम गुरु हैं जो अपने सबसे समर्पित शिष्य को ज्ञान सिखा रहे हैं।
भगवान नृसिंह जो अहोबिलम में आए, वे केवल एक असुर का वध करने नहीं आए थे। वे एक भक्त का जीवन बनाने भी आए थे। शत्रु को नष्ट करना शक्ति का कार्य है। भक्त को ज्ञान देना प्रेम का कार्य है।
— अहोबिलम स्थलपुराणप्रह्लाद की पाठशाला: वह क्षण जब भगवान गुरु बने
हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद को योगासन, योग ध्यान और राजनीति शास्त्र भी सिखाया। प्रह्लाद केवल एक भक्त नहीं था। वह एक राजकुमार भी था। जिसे एक दिन राज्य संभालना था। भगवान ने केवल ध्यान और आसन नहीं सिखाए — उन्होंने यह भी सिखाया कि एक राजा को कैसे शासन करना चाहिए।
भागवत पुराण के सातवें स्कंध में प्रह्लाद का वह उपदेश है जो उन्होंने अपने साथियों को दिया था। उस उपदेश में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अद्भुत संगम है। वह उपदेश उसी शिक्षा का फल था जो भगवान ने यहाँ दी थी।
विग्रह का रहस्य: वह मुस्कान जो नव नृसिंह में सबसे सुंदर है
योगानंद नृसिंह का विग्रह अत्यंत अद्वितीय है। वे पद्मासन में बैठे हैं। उनके पैरों के चारों ओर योगपट्ट बंधा है। और उनके मुख पर एक अत्यंत सुंदर, विस्तृत मुस्कान है। उनके बाएँ चरण के निकट प्रह्लाद की एक छोटी सी मूर्ति है जो अंजलि मुद्रा में है।
ज्वाला नृसिंह उग्र हैं। अहोबिल नृसिंह प्रचंड हैं। किंतु योगानंद नृसिंह मुस्करा रहे हैं। वह मुस्कान उस संतोष की है जो एक गुरु को तब मिलती है जब वह अपने शिष्य को ज्ञान देता है।
ब्रह्मा की उपासना: जब मानसिक शांति के लिए सृष्टिकर्ता यहाँ आए
ब्रह्मा देव ने योगानंद नृसिंह स्वामी की उपासना मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के लिए की थी। ब्रह्मा जो सम्पूर्ण सृष्टि के रचयिता हैं, वे भी मानसिक तनाव से पीड़ित हो सकते हैं। और जब वे तनाव में थे तो वे यहाँ आए।
यदि सृष्टि के रचयिता को शांति यहाँ मिली, तो साधारण मनुष्य के मन की बेचैनी यहाँ दूर होना स्वाभाविक है। योगानंद नृसिंह का यह स्थान वह है जहाँ उग्रता शांति में बदली — जहाँ भगवान स्वयं ध्यान मुद्रा में विराजमान हैं।
— अहोबिलम माहात्म्यप्रह्लाद मेट्टु: वह गुफा जो पाठशाला थी
मालोल नृसिंह मंदिर से लगभग 400 मीटर की दूरी पर एक गुफा है जिसे प्रह्लाद मेट्टु या प्रह्लाद बाडी कहते हैं। उस गुफा के चारों ओर पत्थरीला स्थान है जिसे प्रह्लाद की पाठशाला माना जाता है।
गुफा बहुत छोटी है। एक समय में केवल 7-8 लोग ही बैठ सकते हैं। गुफा में एक कंदरा है जिसके विषय में कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु के सैनिकों ने प्रह्लाद को पर्वत से फेंका था और वे इसी कंदरा में से गिरे। अंततः भगवान विष्णु ने उसी गुफा के भीतर उन्हें थाम लिया।
एक ही पर्वत पर प्रह्लाद के जीवन के दो सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण अंकित हैं — मृत्यु से बचने का क्षण और ज्ञान पाने का क्षण।
शनि ग्रह और योगानंद नृसिंह: वह सम्बन्ध जो मुक्ति देता है
नव नृसिंह और नवग्रहों के सम्बन्ध में योगानंद नृसिंह शनि ग्रह के अधिपति हैं। शनि न्याय, अनुशासन, कर्म और धैर्य का ग्रह है।
प्रह्लाद ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयाँ झेलीं। प्रत्येक कठिनाई में उन्होंने धैर्य रखा। और अंत में भगवान ने उन्हें वह ज्ञान दिया जो मुक्ति का मार्ग है। जिसने प्रह्लाद को हर कठिनाई में धैर्य का पुरस्कार दिया, वही शनि के दोष को भी हरता है।
वह स्थान जो सबसे सुलभ है: भक्ति का सबसे निकट मार्ग
नव नृसिंह में कुछ मंदिर अत्यंत दुर्गम हैं। किंतु योगानंद नृसिंह मंदिर नव नृसिंह में सबसे सुलभ है — निचले अहोबिलम से मोटर योग्य सड़क से दो किलोमीटर की दूरी पर।
यह सुलभता एक संदेश है। भगवान के उग्र स्वरूप तक पहुँचने के लिए कठिन मार्ग तय करना होता है। किंतु उनके शांत, सौम्य, योग मुद्रा वाले स्वरूप तक पहुँचना सरल है। भगवान की करुणा उग्रता से अधिक सुलभ है।
इस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: युद्ध के बाद शांति का समय अधिक महत्त्वपूर्ण है। भगवान ने संहार के बाद का समय प्रह्लाद को शिक्षा देने में लगाया। जीवन में भी जब कोई संकट समाप्त हो, वह समय आत्मचिंतन और ज्ञान के लिए सबसे उपयुक्त होता है।
दूसरी शिक्षा: भगवान सबसे बड़े गुरु हैं। जो भगवान को गुरु मान ले, उसे किसी और गुरु की आवश्यकता नहीं।
तीसरी शिक्षा: शांत मन से की गई उपासना अधिक फलदायी है। ब्रह्मा मानसिक तनाव लेकर यहाँ आए और शांति पाकर गए। जब मन शांत हो तो भगवान की कृपा अधिक सरलता से उतरती है।
चौथी शिक्षा: ज्ञान भक्ति से अलग नहीं है। भगवान ने प्रह्लाद को योग और राजनीति दोनों सिखाए। भक्ति और ज्ञान दोनों आवश्यक हैं। केवल भावना नहीं, विवेक भी चाहिए।
उपसंहार: वह मुस्कान जो आज भी है
निचले अहोबिलम से दो किलोमीटर दूर। एक छोटी पहाड़ी पर। वह मंदिर जो नव नृसिंह में सबसे सुलभ है।
हिरण्य संहार की समाप्ति के पश्चात भगवान नृसिंह यहाँ आए, योगिक मुद्रा में विश्राम किया और प्रह्लाद को योग मंत्र सिखाए। उसी विश्राम की, उसी शिक्षा की, उसी मुस्कान की स्मृति आज भी इस विग्रह में जीवित है।
जो भक्त यहाँ आता है, वह उस कक्षा में बैठता है जहाँ एक बार प्रह्लाद बैठे थे। और भगवान योगानंद नृसिंह उसी मुस्कान से स्वागत करते हैं — "आओ। बैठो। सीखो।"
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
मैं उन उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप, ज्वलंत, सर्वव्यापी, भीषण किंतु कल्याणकारी नृसिंह को प्रणाम करता हूँ — जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
स्रोत एवं संदर्भ: यह लेख arunraj.org, tirthayatra.org, templesinindiainfo.com, ahobilamtours.com तथा अहोबिलम स्थलपुराण एवं ब्रह्माण्ड पुराण के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।